दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११८
हे तीनों लोकों की अधीश्वरी माँ ! हमारी समस्त बाधाओं
को दूर करते हुए शत्रुओं का विनाश करो। यह सुनकर
देवी ने कहा—“हे देवगण ! अठारहवें मन्वन्तर में (१)
शुम्भ-निशुम्भ के वध हेतु नन्द यशोदा के प्रकट होकर विन्ध्याचल
में निवास करूंगी (२) फिर वैप्रचित्त दानवों का विनाश
करने के लिए भयंकर रूप में 'रक्त-दन्तिका' के नाम से
अवतरित होऊँगी (३) दुर्भिक्ष काल में मुनियों के स्तवन से
अयौनिजा अवतरित होकर उन्हें सौ नेत्रों से देखने के कारण
'शताक्षी' तथा प्राणियों को शाक खिलाकर प्राणों की रक्षा के
कारण 'शाकुम्भरी' नाम से विख्यात होऊँगी। उसी अवतार में
दुर्गम नामक महादैत्य का वध करने के कारण 'दुर्गा' नाम से
पूजी जाऊँगी (४) ऋषियों की रक्षा हेतु 'भीमा' देवी के नाम
से प्रकट होकर हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण
करूंगी। तब मुनिवृन्द नत मस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे (५)
तीनों लोकों को संतापित करने वाले 'अरुण' दैत्य का वध
करने तथा तीनों लोकों के कल्याण हेतु भ्रामरी के रूप में
अवतरित होऊंगी। उस समय सब लोग 'भ्रामरी' नाम से
मेरी स्तुति करेंगे।
इस प्रकार जब-जब जगत् में दानवी शक्ति बढ़ेगी तब-
तब उन शत्रुओं के विनाश तथा तुम्हारे कल्याण के लिये मैं
आती रहूँगी। माँ जगदम्बा ने अपने मुख से देवों को आश्वासन
दिया, अपने अवतारों का प्रयोजन तथा नामों का वर्णन किया।
यही उनकी करुणा है।