दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
है साथ ही यह भी जान लेना जरूरी है कि असुर कौन है ?
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ गीता १६/४
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकार संयुक्ता कामराग बलान्विता ॥ १७/५
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुर निश्चयान् ॥ १७/६
दम्भ अहंकार, काम, राग, मद मोह से भरे लोग असुर
हैं असुषु-देहेन्द्रियादिषु रमते, वासनासु रमन्ते त एव असुराः जो
वासना पूर्ति में, इन्द्रियों को तृप्त करने में लगे हैं; वे ही असुर
हैं । गीता के सोलहवें अध्याय के सातवें मन्त्र से अठारहवें मन्त्र
तक शुम्भ-निशुम्भ की समस्त आसुरी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हो
जाती हैं । उदाहरणार्थ श्लोक १०/११ प्रस्तुत हैं-
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद् गृहीत्वा सद् ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचि व्रताः ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोग परमा एतावदिति निश्चिताः ॥गी.अ.१६/१०-११
काम भोग परायण असुर होते हैं। ‘नितरां शेरते चेष्टा येषाम्’
जो बेहोश हैं वे निशाचर हैं। शुम्भादि दैत्यों के नाम भी सार्थक
हैं। आपने अभी सुना है कि असुर वे हैं जो इन्द्रियों की पूर्ति
में प्रसन्न होते हैं और साधक या सुर वे हैं जो इच्छाओं की
निवृत्ति में प्रसन्न होते हैं ।
साधक के जीवन में यही प्रबल पुरुषार्थ है कि वह
इच्छाओं की निवृत्ति करे । विषयासक्ति-जिसे रक्त-बीज बताया
गया है, उसका नाश करें तभी काम-क्रोध, लोभ, मोहादि पर
विजय मिलेगी । इसी से परम सुन्दरी, परम सुकुमारी पराम्बा
की सवारी सिंह है जो गहन विपिन का राजा है, स्वयं शिकार