दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०६
उनके शरीरों से निकलकर चण्डिका की सहायता के लिए दैत्य-
दलन हेतु समरांगण में आ गईं ।
बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, दैत्यों की वाहिनी प्रातः कालीन ओस
की बूँदों की तरह विनष्ट हो रही थी, तभी रक्त बीज इन्द्र की
शक्ति ऐन्द्री के वज्र से घायल हो गया । उसकी प्रत्येक रक्त-बूँद
से उसी के समान बल-पराक्रम सम्पन्न आयुधों से युक्त भयंकर
राक्षस वीर पैदा होकर मातृकाओं को मारने लगे ।
यावन्त पतितास्तस्य शरीराद्रक्त विन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद् वीर्यबल पराक्रमाः ॥ ८/४४
ज्यों-ज्यों इस रक्तबीज के शरीर पर प्रहार होता, रक्त-
पतन से अनेक असुर वर्षा में पैदा होने वाले जीवों की तरह पैदा
हो कर लड़ने लगते । इस दृश्य से देवता बड़े भयभीत हुए । उन्हें
उदास देखकर चण्डिका ने काली को अपने शस्त्रपात से गिरने
वाले रक्त विन्दुओं और उनसे उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को मुख
से भक्षण करने का आदेश दिया । चामुण्डा की इस प्रक्रिया से
महा भयावह रक्तबीज युद्ध में मारा गया । देवताओं को अनुपम
हर्ष प्राप्त हुआ । मातृ-गण नृत्य करने लगा ।
इस अध्याय में रक्तबीज वध का प्रसङ्ग बड़ा शिक्षा प्रद
एवं महत्त्वपूर्ण है । बड़ा सुन्दर संकेत है—यह 'रक्त-बीज'
इच्छाओं का नाम है । मनुष्य की इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं
होती हैं । प्रत्येक इच्छा सगर्भा होती है जैसे ही एक इच्छा
समाप्त होती है वैसे ही उससे भी अधिक प्रबल इच्छा पैदा हो
जाती है । इससे विषयों की अभिलाषा नष्ट करना साधक के
लिए कितना कठिन है । यह इस प्रसङ्ग से समझ सकते हैं ।
इन्द्रियाँ अथवा करण तो चौदह हैं; परन्तु प्रत्येक करण के विषय
अनन्त हैं । उनका पार पाना बहुत कठिन है । जैसे रक्त बीज
के रक्त की एक बूँद में जब इतनी प्रबलता है भला बताइए
कितनी बूँदें हुई होगी । यही असंख्य शब्द का प्रयोग विषयों की