दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०८
नवमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बन्धूक काञ्चननिभं रुचिराक्षमालां
पाशांकुशौ च वरदां निजवाहुदण्डैः ।
विभ्राणमिन्दु शकलाभरणं त्रिनेत्र
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥
बन्धूक-दुपहरिया पुपहरिया पुष्प की रक्तिमा-लालिमा
तथा स्वर्ण की पीतिमा की कान्ति से सुशोभित अर्द्ध नारीश्वर
के श्री विग्रह की शरण लेता हूँ; जो अपनी भुजाओं में सुन्दर
अक्षमाला, पाश, अंकुश और वरद मुद्रा धारण किये हुए हैं;
जिसके ललाट पर अर्द्ध चन्द्र का आभूषण आभूषित है और तीनों
नेत्रों से सुशोभित है ।
मधु-कैटभ का वध हो या धूम्रलोचन का ध्वंस, अथवा
चण्ड-मुण्ड संहार या फिर रक्तबीज के रक्त-पान से विनाश,
इन सब का उद्धार हुआ करुणामयी माँ के हाथ से। यह दैवी
कृपा का विधान है कि जिसे हम लय, प्रलय, विनाश, ध्वंस
कहते हैं वह कष्टों से, दुःखों से मुक्ति है। इसी में लोक-कल्याण
निहित है, अतः प्रत्येक मङ्गलाकांक्षी को भगवती का ध्यान
करना चाहिए ।
भगवती के चरित्र-लीला के आनन्द में निमग्न जिज्ञासु
राजा ने महामति मेधा से विनत भाव से कहा—भगवन् ! आपके
द्वारा रक्त-बीज के वध से सम्बन्धित देवी-चरित्र की यह अद्भुत
महिमा जानकर बड़ी उत्सुकता हो रही है कि इसके पश्चात्
क्रोध में भरे हुए शुम्भ-निशुम्भ ने क्या किया; सुनना चाहता
हूँ ।
महामुनि मेधा ने बताया—राजन् ! जन-धन-बल का संयोग
जैसे मनुष्य को खुशी देता है उसी प्रकार इनका वियोग महा