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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११०
से आसुरी वृत्तियाँ संयम, नियम के द्वारा नियंत्रित करने पर
भी पैदा हो जाती है, जो हमारी दैवी वृत्तियों को निगलना
चाहती है । अतः साधक को सजग रहना चाहिए, माँ की शरण
लेनी चाहिए । माँ के निम्न मंत्र से सब मनोरथ पूरे हो सकते
हैं-
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ कवच ४४ ॥
माँ की शरण में पहुँचने पर मनुष्य की निश्चित ही समस्त
कामनायें पूर्ण होती हैं और वह परम ऐश्वर्य का भागी होता है ।
अतः माता की शरण लेना जीवन की सार्थकता है ।