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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 156 में से

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पृष्ठ 141

११७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सर्व रोग विनाशिनी, सर्वमनोरथ सिद्धिदायिनी, विपद्
विदारिणी, सर्व शरण प्रदायिनी, माँ तुम्हें नमस्कार है । हे
देवि ! दैत्यों के विनाश हेतु आपने विविध रूप धारण किये थे,
आपको नमस्कार है ! विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने
वाले शास्त्रों में; तथा वेदों में तुम्हारा ही वर्णन है । तुम्हीं
संसार को अविद्या द्वारा बांधने वाली और विद्या द्वारा मुक्त
करने वाली हो, अतः तुम्हें नमस्कार है ।
जहाँ राक्षस, शत्रु, सर्प आदि विषैले जीव, डाकू और
भयंकरतम परिस्थितियों में रहकर तुम ही विश्व की रक्षा करती
हो । हे विश्वनाथ वन्दनीये ! जो तुम्हें प्रेम से प्रणाम करते हैं;
उन्हें आपके आश्रय का अनुभव होता है । अभी आसुरी
सम्पत्ति का विनाश कर दैवि-सम्पति का विकास किया है । हम
सब आपकी शरण में हैं; कोटि-कोटि नमन करते हैं प्रसन्न होकर
वरदान दीजिए ।
हे मातु भवानी, जगजननी, संकट हरणी, जन मन भरने दो ।
माँ हम सब तेरे बालक हैं, चरण तले निज तुम रहने दो ॥ हे०
देव पड़े जब विपदा में थे, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गरजो, फिर रूप वही दरसाने दो ॥ हे०
शुम्भ निशुम्भ को तुमने मारा, महिषासुर को तूने पछाड़ा ।
तूने रक्त बीज संहार किया, वह परम छटा बरसाने दो ॥ हे०
तूने जीवन दान दिया है, तूने उबारा, तुम्ही उबारो ।
भव पार लगे जीवन नैया, सब जन-मन को हरषाने दो ॥ हे०
इस प्रकार देवताओं की स्तुति को सुनकर माँ जगदम्बे
बड़ी प्रसन्न हुई और उन्हें वरदान मांगने के लिये कहा । तब
देवों ने कहा—
सर्व बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरिविनाशनम् ॥ ११/३६