दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दुःखदायो बन जाता है, वह क्रोध में आग बबूला हो जाता है ।
अतः स्वाभाविक था कि रक्त बीज जैसे सेनापति तथा विशाल
सेना के मारे जाने पर शुम्भ-निशुम्भ का बौखला जाना
स्वाभाविक था । विमर्ष में भरकर निशुम्भ देवी की ओर दौड़ा ।
इसके साथ विशाल दैत्य सेना थी । शुम्भ भी मातृगणों से युद्ध
करके चण्डिका को मारने आ पहुँचा । दिव्य अस्त्रों से भयंकर
युद्ध हुआ । निशुम्भ ने तीखी तलवार से देवी के वाहन पर प्रहार
किया, फिर क्या था ? माँ ने उसके अनेक प्रहारों को अपने रण-
कौशल से छिन्न-भिन्न कर दिया । काली ने दोनों हाथों के आघात
से पृथ्वी को हिला दिया । शिवदूती ने दानवों के लिए अमंगल-
कारी अट्टहास किया, देवों ने जय-जयकार किया, इसी उपयुक्त
अवसर पर देवी ने राक्षस शुम्भ पर अपना शूल चला दिया, वह
मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
भाई के पतन को निशुम्भ सहन न कर सका, उसने अपने
बाणों से देवी, काली तथा सिंह को घायल कर दिया । दुर्गम
पीड़ा विनाशिनी दुर्गा ने कुपित होकर उसके बाणों और चक्रों
को काट कर अपने शूल से उसकी छाती विदीर्ण कर दी, जिससे
दूसरा महाबली पुरुष निकल कर देवी को ललकारने लगा, देवी
ने ठठाकर हँसते हुए तीक्ष्ण खड्ग से उसका सिर काट डाला ।
सिंह ने दैत्यों की गर्दन नोची, कालिका ने अनेक दैत्यों का भक्षण
किया । वैष्णवी ने चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए । शेष
भाग गये । इस प्रकार निशुम्भ का वध हुआ ।
इस युद्ध से विदित हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा
इनकी शक्तियाँ-ब्रह्माणी, रुद्राणी, वैष्णवी, कालिका, दुर्गा सभी
एक हैं; इस एक तत्व की उपासना ही लक्ष्य होना चाहिए चाहे
इष्ट किसी भी स्वरूप को बनायें ।
दूसरी बात यह है कि निशुम्भ की छाती से दूसरे पुरुष का
पैदा होकर पुनः देवी को ललकारने का तात्पर्य यह है कि चित्त