बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
१२ बुल्ला साहिब का शब्दसार
सुर नर मुनि जाको अंत न पावहिं, सो मोरे नैनन आगो ॥३॥
हरि रँग जुगन जुगन उँजियारो, जन बुल्ला साधुन साँगों१ ॥४॥
॥ शब्द १३ ॥
भासत२ काहे न जोगिया, यह मरै बिरह दुख रोगिया ॥ १ ॥
बिनु जोगी समुझे कल न परतु है, क्यों जीबै जन रोगिया ।
घोर घनेरी सूल उठत है, यह दुख जानै रोगिया ॥ २ ॥
आवै जोगी करै तबीबी३, तब सुख पावै रोगिया ।
मथि मन पवन जे दारू४ लगाई, जन बुल्ला दुख भगिया ॥ ३ ॥
॥ शब्द १४ ॥
न्हान को गंग जमून तट जैबों ।
तन मन धन न्यौछावर वारों, जगमग जोति जगैबों ॥ १ ॥
पवना उलटि भजन नित करिबों, सुखमन सेज बिछैबों ।
प्रेम बिलास आस साधुन में, निर्गुन रूप कहैबों ॥ २ ॥
पाप पुन्न दुख सुखहिं बहैबों, अमृत नाम पियैबों ।
होत अनन्द बिनोद ब्रह्म को, बहुरि न या कलि ऐबों ॥ ३ ॥
दया धरम मेरे नाम खजाना, ज्ञान रतन भरि लैबों ।
अद्भुत रूप कहाँ लग बरनों, अनहद में हद कैबों ॥ ४ ॥
सुरति सुहागिन चरन मनावहि, खसम आपनो पैबों ।
जन बुल्ला है प्यारी खसम की, रहसि रहसि गुन गैबों ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
हे मन करु गोबिंद से प्रीत ।
बीच मैदान में देइयो, चौहट नगारा जीत ॥टेक ॥
स्त्रवन सुनि ले नाद प्रभु की, नैन दरसन पेख ।
अचल अमर अलेख प्रभुजी, देखही कोउ भेष ॥ १ ॥
भाव सँग तू भक्ति करि ले, प्रेम से लवलीन ।
सुरति से तू बेर५ बाँधो, मुलुक तीनो छीन ॥ २ ॥
(१) संग । (२) दरसना । (३) इलाज । (४) दवा । (५) बेड़ा ।
ब्रह्मज्ञान १३
अधम अधीन अजाति बुल्ला, नाम से लवलीन ।
अर्थ धर्म अरु काम मोछहिं, आपने पद दीन ॥ ३ ॥
ब्रह्मज्ञान
॥ शब्द १ ॥
जिन जिन जन्म लखो१, तिन को दरस भयो ।
आनंद मगन रहत निस बासर, दुबिधा धोख जँजाल गयो ॥ १ ॥
जन्म पदारथ यहि जो स्वारथ, पाँच तत्त गुन तीनी ।
उलटि निरंतर निरखि बिचारो, परम तत्त निज चीन्ही ॥ २ ॥
बार बार के अवन गवन में, कर्म भर्म की धार ।
खोजत खोजत सतगुरु पाये, उतरि परो भवपार ॥ ३ ॥
बैठो जाइ के संत सभा में, जहाँ अमरपुर लोग ।
आवागवन कबहिं नहिं होई, इहै हमारो जोग ॥ ४ ॥
जन बुल्ला ब्रह्मज्ञान बोलतु है, सकल बेद को मूल ।
बूझन वाले बूझि लहिंगे, जिन्ह देखी सब खूल२ ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
हौं बौरहा दिवाना तातें बोलत हौं ब्रह्मज्ञाना ॥ टेक ॥
संतन जहाँ जहाँ मन माना, दूजा दूरि लुटाना ॥ १ ॥
परम जोति से ध्यान लगो है, आवा गवन नसाना ॥ २ ॥
उलटि सर्प जब माँद३ समाना, बिधि परपंच मिटाना ॥ ३ ॥
जन बुल्ला दाया सतगुरु की, ऐसा अमल कमाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
संतो अमल हमारे नाम की ॥ १ ॥
आठ पहर मन छकै रहतु है, परम तत्त निरकार४ की ॥२॥
रहत अधार सत्त सुकिरति कै, मेटे भरम बिकार की ॥३॥
(१) जिस जिस ने जन्म लखा यानी बारम्बार जनम मरन की पीड़ा को बिचारा ।
(२) जानकार (अभ्यासी) कि जिन्होंने अभ्यास की आँखों से सब भेद खुला देखा है वही
जान लेंगे । (३) बाँबी । (४) निरंकार ।
१४ बुल्ला साहिब का शब्दसार
सहजहिं चढ़ो अकास आस लै, लहरि उठत ब्रह्मज्ञान की ॥४॥
सुमिरत चरन कमल धरनी धर, उज्ज्वल बिमल बिकार की ॥५॥
जन बुल्ला यहि पदहिं समाने, फिरी दुहाई नाम की ॥६॥
॥ शब्द ४ ॥
उलटै पवन मवन१ ह्वै रहई । धरै ध्यान निर्गुन तत गहई ॥१॥
झलक झलक निर्गुन कै जोती । कोटिक भानु उदै छबि होती॥२॥
बाजत अनहद गगन अघोश । मगन भयो तहवाँ मन मोरा ॥३॥
जन बुल्ला कहैं इहै अधारा । राम राम कहि करहि पुकारा ॥४॥
॥ शब्द ५ ॥
ऐसी बिनय सुनहु अबिनासी । अब कि बार काटहु जम फाँसी॥१॥
भया प्रकास मिटा अँधियारा । आदि अंत मध भो उँजियारा ॥२॥
रूप रेख तहँ बरनि न जासी । निरंकार आपुहिं अबिनासी ॥३॥
जन बुल्ला तहँ रहै हजूरा । पूरन ब्रह्म देखा जहँ
भेद १५
तीनिउ जना त्रिबेनी आना, गंग जमुन कीन्हो अस्नाना ॥३॥
परम तत्त पर लागो ध्याना, जन बुल्ला बोलहि ब्रह्मज्ञाना ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
अहो मन ज्ञानी, तूँ तौ परम प्रीति पहिचानी ॥ टेक ॥
उदय अस्त जा कि महिमा बोलै, सब घट अमृत बानी ॥१॥
सुरति डोरि लव लागि रहानी, राम नाम निजु जानी ॥२॥
रबि ससि पवन बिलोकै मनुवाँ, गगन मगन मन मानी ॥३॥
अगम अपार सिंधु सागर प्रभु, कह बुल्ला जिन जानी ॥४॥
॥ शब्द १० ॥
महबूब दिवाना पियत पियाला, निर्गुन खाना ॥ १ ॥
निर्गुन खाना त्रिकुटी जाना, साध संगति पहिचाना ॥ २ ॥
निरगुन खाना हरदम जाना, अष्ट जाम मस्ताना ॥ ३ ॥
निरगुन रूप बोलहि जन बुल्ला, पाया गगन रकाना¹ ॥ ४ ॥
॥ भेद ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु मुक्ति बतावल, पावल जिव कर मूल ।
सुमिरि सुमिरि सुख बिलसहि², सूच्छम गुन अस्थूल ॥ १ ॥
ऐसन अद्भुत है सो, जुग जुग अचल अपार ।
आवै जाय न उपजै बिनसै, सदा रहै इकतार ॥ २ ॥
मन माने की कहिये, तौ लहिये औतार ।
अपने अपने रंग में, रँगा सकल संसार ॥ ३ ॥
मनसा बाचा कर्मना, दूजा नहिं भाव ।
जन बुल्ला गुन गावही, आनँद मँगल बधाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
बूझहु पंडित अचरज एक । सेत बरन तहँ सदा अलेख ॥१॥
साधि पवन षट चक्र छुड़ावो । तिरबेनी के घाटै आवो ॥२॥
(१) तोशा, सामान । (२) बिलास करता है ।
१६ बुल्ला साहिब का शब्दसार
उनमुनि मुद्रा लगी समाधी । रबि ससि पवनहिं राखो बाँधी ॥३॥
चाचरि मुद्रा से प्रीति लगावो । भूचरि मुद्रा से प्रेम बढ़ावो ॥४॥
अगोचरि मुद्रा से आन भुगावो । खेचरि मुद्रा से दरस दिखावो॥५॥
जो पंडित तैं करु पंडिताई । चरन रेनु हिरदे लै लाई ॥६॥
चरन रेनु का करहु जनेवा । तौ तू पंडित पावहु भेवा ॥७॥
जो यह अचरज देइ बुझाई । सोई सतगुरु अगम कहाई ॥८॥
अगम जोति का धारै ध्यान । बुल्ला बोलहि सब्द निदान ॥६॥
॥ शब्द ३ ॥
राम राय लावल फुलवारी ॥ टेक ॥
मूल सींचि के बाग लगाया । कलियाँ भई तबहिं चुनवाया ॥१॥
एक फूल ते अनेक कहाय । फूल भरी भरि रहि कुम्हिलाय ॥२॥
काहू फूल क मरम न पाया । सरगुन मद्धे रहल समाया ॥३॥
जन बुल्ला सतगुरु बलिहारी । सेत फूल जिन लिहल बिचारी॥४॥
॥ शब्द ४ ॥
मोर सुमति भइल, मन जतन बिसारी रे ॥ टेक ॥
मूरहिं बाँधी सूरहिं१ साधी, पच्छिम बिचारी रे ॥ १ ॥
लोभ मोह अरु माया छाया, भरमन सब टारी रे ॥ २ ॥
छूटी माया तन पाया छाया, ब्रह्म की जोती रे ॥ ३ ॥
जन बुल्ला जोगी बोलहि, निझर भरै जहँ मोती रे ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
आनँद उदित अखंडित सोहं, मानो गगनद्वार गति जोहं ॥१॥
सिद्धी मूलि मूल मति पावन, जामन पवनहिं उलटि जमावन॥२॥
अर्ध उर्व के मद्ध निरंतर, जगमग जगमग जोति जगावन ॥३॥
देखि दिखावै कहावै अकेला, मेला अलख पुरुष सँग खेला ॥४॥
जन बुल्ला याही बिधि खेला, अनहद डंक निसंक को देला ॥५॥
(१) स्वर ।
भेद १७
॥ शब्द ६ ॥
आली आजु कि रैन प्रीति मन भावै ॥ १ ॥
गाय बजावत हँसत हँसावत, सब रस लेय मनावै ॥ २ ॥
जन बुल्ला हरि चरन मनावै, निरखि सुरति गति आपु में पावै ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
नैना मोरे निपट बिकट ठौर अटके ॥ १ ॥
सुख को साथ सबै कोइ चाहै, दुखहिं परे पर छटके ॥ २ ॥
भौंह कमान नैन दोउ गाँसी, जहाँ लगै तहँ लटके ॥ ३ ॥
जन बुल्ला दाया सतगुरु की, देखु सकल जग भटके ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
पूरब देस कर आपुहिं बँभना, आपु भयल अबधूता ॥ टेक ॥
अपरम्पार पारब्रह्म बँभना, आयो हमरे घर अँगना ।
परम तत्त ले पूजि आपु हीं, सरल१ गावै अनहद ततना२ ॥ १ ॥
रजगुन तमगुन सतगुन सारल, हारल तन मन दोऊ ।
गगन मँडल में हरि रस चाखल, बूझै बिरला कोऊ ॥ २ ॥
ज्ञान कि तरकस सब्द तीर भरि, प्रेम धनुष धरि तानल ।
सुरति कै सीस निसाना मारल, भव का भंडा फोरल ॥ ३ ॥
निर्भय जन इक निर्गुन गावल, स्वासा सगुन भावल ।
जन बुल्ला बिन स्वासहि गावहि, सेत प्रकास समावल ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
चरन लागो इत तें हारो ॥ टेक ॥
ममता मान जान तन वारो । ब्रह्मा बिस्नु समाधी धारो ॥ १ ॥
तिरबेनी तिर घाट सँवारो । जगमग जगमग मनि उँजियारो ॥ २ ॥
भाग बड़ो जिन यह गति सारो । पवन पियाय नागिनी मारो ॥ ३ ॥
बिष उतरो तब भो उजियारो । बुल्ला रहै सदा हुसियारो ॥ ४ ॥
(१) साधारण ही । (२) तान ।
३
१८ बुल्ला साहिब का शब्दसार
॥ शब्द १० ॥
बुल्ला कवने द्वारा देखै आपु ॥टेक॥
कवने द्वारा आवै जाय । कवने द्वारा रहै समाय ॥ १ ॥
तिरबेनी द्वारे देखै आपु । सुखमन द्वारे सुमिरै जापु ॥ २ ॥
इँँगला पिंगला आवै जाय । दसव द्वारा रहै समाय ॥ ३ ॥
आरती
॥ शब्द १ ॥
ऐसी आरति मेरे मन भावै । रबि ससि पवन भवन मन लावै ॥१॥
ब्रह्मा बिसनु महेस लै आवै, एक मते ह्वै अरथ दिखावै ॥२॥
गंगा जमुना अरघ दिवावै, अस्तुति से जा प्रभुहिं मनावै ॥३॥
सुरति निरति लै घंट बजावै, जगमग जोति परम पद पावै ॥४॥
जन बुल्ला जो सरन बसि आवै, रंग महल बिच नाम जगावै ॥५॥
॥ शब्द २ ॥
पूजों निरकार बहु भाँती । जेकरे पुजत सितल१ मोरी छाती ॥१॥
जाके न चंद सूर दिन राती । नेम अरु धर्म न दीपक बाती ॥२॥
[
तहँ मिलै बिरही हंस जन कोउ, अगम दियो है लखाय ॥ ६ ॥
तहँ दास बुल्ला कियो संगति, रह्यो चरन समाय ॥ ७ ॥
( २ )
सतगुरु नावल अधर हिंडोलना ।
हम धन झुलब सुघर हिंडोलना ॥ १ ॥
झुलत झुलत गइलुँ गगनहिं तटना ।
तहवाँ साधन को अखरना१ ॥ २ ॥
सेत सुहावन जगमग देखलना ।
तहवाँ प्रान हमार समैलना२ ॥ ३ ॥
अब कि समैले फिर न अइबना३ ।
जन बुल्ला गावल निर्गुन हिंडोलना ॥ ४ ॥
बसंत और होली
( १ )
मन बसंत खेले अगम फाग, चरन कमल अनुराग जाग ॥१॥
खेले ब्रह्मा औ महादेव, खेले नारद औ जैदेव ॥२॥
खेले ध्रुव प्रहलाद जानि, खेले सुकदेव भक्ति मानि ॥३॥
हनुमत खेले सेवक होय, अरजुन खेले गति बिलोय४ ॥४॥
सहदेव खेले अगम गाय, परम जोति में रहे समाय ॥५॥
खेले नाभा औ कबीर, खेले नानक बड़े धीर ॥६॥
दसम द्वार पर दरस होय, जन बुल्ला देखे आपु सोय ॥७॥
( २ )
हरि हम देख्यो नैनन बीच, तहाँ बसंत धमारि कीच ॥१॥
आदि अंत मधि बन्यो बनाय, निरगुन सरगुन दोनों भाय५ ॥२॥
चीन्हेव तिन्हको लियो लगाय, अनबूझो रहि गो मुँह बाय ॥३॥
सुन्न भवन मन रह्यो समाय, तहँ ऊठत लहरि अनंत आय ॥४॥
जगमग जगमग है अँजोर, जन बुल्ला है सेवक तोर ॥५॥
(१) अखाड़ा । (२) समाया । (३) आना । (४) मथ कर । (५) भाव ।
२० बुल्ला साहिब का शब्दसार
( ३ )
होरी खेलो सतगुरु दयाल से ।
धन जोबन सपना करि जानो, मेलो जोति अपार से ॥१॥
होत अगाध अकास सब्द धुनि, सुनत रहो सुख चाह से ।
साहिब सुरति मुरति हिय लागी, केल करत हर हाल से ॥२॥
एक तान इक मान मनावै, एक ज्ञान इक ध्यान से ।
एक दसा इक भाव भक्ति लै, मिलो बुंद दरियाव से ॥३॥
अलख लखायो दरस दिखायो, खेलत फाग सुचाल से ।
जन बुल्ला ऐसी होरी खेले, उतरि गये भव जाल से ॥४॥
( ४ )
होरी खेलो रंग भरी, सब सखियन संग लगाई ॥ टेक ॥
फागुन आयो मास अनँद भो, खेलि लेहु नर नारी ॥ १ ॥
ऐसा समय बहुरि नहिं पैहो, जैहो जन्म जुवा हारी ॥ २ ॥
तीर त्रिबेनी होरी खेलो, अनहद डंक बजाई ॥ ३ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस तिनों जन, रहे चरन लिपटाई ॥ ४ ॥
बनि बनि आवैं दरस दिखावें, अद्भुत कला बनाई ॥ ५ ॥
जन बुल्ला ऐसि होरी खेले, रहे नाम लौ लाई ॥ ६ ॥
( ५ )
निर्गुन बसंत को सुनहु भाव । दूजा अवरि न मोहिं चाव । १॥
हुलसी मनसा फलसी डाल । वा की साखा सर्ग पताल ॥२॥
बिना मूल अस्थूल आहि । वाकी पटतर लाउँ काहि१ ॥३॥
ज्ञान ध्यान बसि भयो मोर । तन से भागे सबहि चोर ॥४॥
दसौ दिसा में भयो सोर । बुल्ला सेवक प्रभू तोर ॥५॥
॥ शब्द ६ ॥
हौं खेलत फाग सुहावन, हरि आये मन भावन ॥१॥
जब तें कृपा कियो आ जन पर, मोच्छ मुक्ति फल पावन ॥२॥
(१) किस को ।
द्वितीय भाग: अमर पद एवं शब्दसार उपसंहार
रेखता २१
बाजत ताल मृदंग डफ्फ सुर, सरस१ राग सुर गावन ॥ ३ ॥
देत दान तन मन न्योछावरि, भाँवरि संत सुभावन ॥ ४ ॥
जन बुल्ला ऐसी होरी खेलो, अद्भुत कला समावन ॥ ५ ॥
भूलना
( १ )
जहँ आदि न अंत न मद्ध है रे, जहँ अलख निरंजन है भेला ॥ १॥
जहँ बेद कितेब न भेद है रे, नहिं हिन्दू तुरुक न गुरु चेला ॥२॥
जहँ जीवन मरन न हानि है रे, अगम अपार में जाय खेला ॥३॥
बुल्ला दास अतीत यों बोलई, यारी सतगुरु सत सब्द देला ॥४॥
( २ )
प्रेम हिंडोलना भूलना रे, जहँ अलख धनी की मौज घनी ॥१॥
तहँ वार पार दरियाव नहीं, नाहीं आवन नाहीं जानी ॥२॥
अचल अमर घर बैठि के रे, मगन भयो नहिं ख्याल अपनी । ३॥
बुल्ला दास अतीत यों बोलै, उलटि कँवल गगन आनी ॥४॥
रेखता
( १ )
प्रीति की रीति से जीति मैदाँ लिया,
पवन के घोरा२ से जोरा जाय किया है ॥ १ ॥
पाँच अरु तीन पच्चीस को बसि किया,
साहिब को ध्यान धरि ज्ञान रस पिया है ॥ २ ॥
तहँ भूख औ प्यास नहिं आस औ बास नहिं,
एक साहिब से ब्रह्म जाय थिया३ है ॥ ३ ॥
दास बुल्ला कहै अगम गति तौ लहै,
तोरि के कुफुर तब गगन गढ़ लिया है ॥ ४ ॥
(१) रसीला। (२) घोड़ा। (३) स्थिर हुआ।
२२ बुल्ला साहिब का शब्दसार
( २ )
गगन के मँडल मगन मन में हुआ,
अध से उर्ध भरि परी बेरी ॥ १ ॥
सेत परकास आकास में फूलि रहि,
बसत है प्रान सुख चैन हेरी ॥ २ ॥
तहँ काया माया नहीं मरन जीवन नहीं,
एक साहिब की भई चेरी ॥ ३ ॥
दास बुल्ला कहै अगम गति तौ लहै,
धन्न सतगुरू महिमा तेरी ॥ ४ ॥
( ३ )
जिन को हरि नाम से नेह लगो,
तिनको अब गेह की काहे की आसा ॥ १ ॥
परतीत बनी निज साधुन से,
जिन गगन गुफा में दियो बासा ॥ २ ॥
जगमग जोति अपार बिराजत,
जम जालिम की कटी फाँसा ॥ ३ ॥
बुल्ला हिरदय बिचारि बोलै,
बँद छोड़ निरंजन देखु तमासा ॥ ४ ॥
( ४ )
रेखता २३
( ५ )
गाजत है छबि छाजत है,
उतै नाम निरंजन की गति हेरी ॥ १ ॥
राह लियो परमारथ की,
तब स्वारथ संजम सत्त की चेरी ॥ २ ॥
बानी बोल बिलास कि आनी,
मरन जिवन नहिं भव में फेरी ॥ ३ ॥
बुल्ला हिरदय बिचारि बोलै,
ऐसो ध्यान निरंतर राम से मेरी ॥ ४ ॥
( ६ )
बलि हौं बलि हौं सतगुरु की,
जिन ध्यान दियो परमेसुर को,
त्रिकुटी संगम निज राह निबेरी ॥ १ ॥
प्रेम बिलास अकास में बास है,
आवागवन रहित भौ फेरी ॥ २ ॥
अनहद बाजे झनकार कि बानी,
बिन सरवन तहँ सुनत है टेरी ॥ ३ ॥
बुल्ला हिरदय बिचारि बोलै,
ब्रह्मज्ञान कि बात सुनो मेरी ॥ ४ ॥
( ७ )
जो पै कोउ ध्यान में सदा रहै,
लहै ब्रह्मज्ञान तब साध जाय कहा है ॥१॥
मूल को साधि के पवन को बाँधि के,
त्रिकुटी में आइ के गगन द्वार जोहा है ॥२॥
जोती से जोती मिलो पवन में पानी मिलो,
धरती में अकास मिलो अनहद जाय गहा है ॥३॥
२४ बुल्ला साहिब का शब्दसार
दास बुल्ला कहै अगम गति तब लहै,
गुरु के बचन से अचल घर लहा है ॥ ४ ॥
( ८ )
जिन से अब जोग जुगति बनि आयो,
अरध उरध तिरबेनी न्हाई ॥ १ ॥
सब पाप जु दोष बहाय दियो,
हरि नाम निरंजन परी दुहाई ॥ २ ॥
दूसरो न अवर है यहि कलि में,
जिन तिहुँ लोक रचि रच्यो बनाई ॥ ३ ॥
बुल्ला हिरदय बिचारि बोलै,
गुरु ज्ञान आध्यातम¹ देखो भाई ॥ ४ ॥
( ६ )
आँधरे ने देखो हाथी साथी सब भूलि गयो,
फूलो ब्रह्म जैसे रबि ससि सुहाई है ॥ १ ॥
सोई मूल सोई स्थूल सोई फूल फूलि रह्यो,
सोई जुग जुग देखो आपु रूप वोई है ॥ २ ॥
आदि अंत मद्ध वोई नीके करि देखो जोई,
सोई त्रिभुवन नाथ बूझै गति कोई है ॥ ३ ॥
गुरु गम होय बोलै नेकु नाहीं चित्त डोलै,
जन बुल्ला निज घर सहज समोई है ॥ ४ ॥
अरिल छन्द
( १ )
कोटि भुलै ध्रुव ज्ञान हिये नहिं आइया ।
राम नाम को ध्यान धरो मन लाइया ॥
बिना ध्यान नहिं मुक्ति पिछे पछिताइया ।
बुल्ला हृदय बिचारि राम गुन गाइया ॥
(१) अध्यात्म रामायण ।
अरिल छंद २५
(२)
स्याम घटा घन घेरि चहूँ दिसि आइया।
अनहद बाजे घोर जो गगन सुनाइया॥
दामिनि दमकि जो चमकि त्रिबेनी न्हाइया।
बुल्ला हृदय बिचारि तहाँ मन लाइया॥
(३)
सुखमन सीतल सेज हेत ताही से कीजै।
गगन गुफा में पैठि दरस सतगुरु का लीजै॥
आवागवन न होय ब्रह्म कबहूँ नहिं छीजै।
बुल्ला हिरदय प्रेम भरि अम्मर पद लीजै॥
(४)
सामहिं उगवे सूर भोर ससि जागई।
गंग जमुन के संगम अनहद बाजई॥
अजपा जापहिं जाप सोहं डोरि लागई।
बुल्ला ता में पैठि जोति में गाजई॥
(५)
झूठा यह संसार झूठ सब कहत है।
सत्त सब्द की रहनि कोऊ नहिं गहत है॥
बिना सत्त नहिं गत्त कुगत्त परत है।
बुल्ला हृदय बिचारि सत्त से रहत है॥
(६)
मुरगी यह संसार चेहुँ चेहुँ करत है।
आतम राम को नाम हृदय नहिं धरत है॥
बिना राम नहिं मुक्ति झूठ सब कहत है।
बुल्ला हृदय बिचारि राम सँग रहत है॥
(७)
ऐसी बनिज हमारि राम को लेन को।
मन पवना दोउ दाम साहु को देन को॥
४
२६ बुल्ला साहिब का शब्दसार
पाँच पचीस तिन¹ लादि आपु में बैठि के ।
बुल्ला दीन्हो हाँकि जोति में पैठि के ॥
( ८ )
क्या भयो ध्यान के किये हाथ मन ना हुआ ।
माला तिलक बनाय देत सब को दुआ² ॥
आसा लागा डोरी कहत भला हुआ ।
बुल्ला कहै बिचारि झूठ सेमर धुआ³ ॥
( ९ )
का भयो सब्द के कहे बहुत करि ज्ञान दे ।
मन परतीत नहीं तो कहा जम जान दे⁴ ॥
का भयो तीरथ किये हिये नहिं आवई ।
बुल्ला कहै बिचारि खाली सब जावई ॥
( १० )
मन माने की बात बहुरि नहिं बोलना ।
अबिनासी से प्रीति कबहुँ नहिं डोलना ॥
बनि आई मोरी प्रीति तो आतम राम से ।
बुल्ला नैनन देखि बैठु आराम से ॥
( ११ )
सनमुख धारै ध्यान तो कर्म नसावई ।
निर्गुन जपै अपार परम पद पावई ॥
तन छूटे गति होइ बहुरि नहिं आवई ।
बुल्ला हृदय बिचारि बोलि हरि भावई ॥
मिश्रित
॥ शब्द १ ॥
जन कहँ समुझि परी यहि बारी, दीयो सब्द बिचारी ॥ टेक ॥
(१) तीन । (२) आसीस । (३ सेमर की टोंटी में सुवा फल की आस करके चोंच
मारता है परन्तु उससे धुआ यानी रुई निकलती है । (४) शब्द भजन के गाने और ज्ञान
उपदेश करने से क्या होगा, जब कि मन में प्रतीत नहीं है तो जमराज कैसे जाने देगा ।
मिश्रित २७
मन को मारि मूँदो नव द्वारी, जीतो पाँचो नारी ॥ १ ॥
परम तत्त निरंकार ध्यान धरि, बहुरि नहीं अवतारी ॥ २ ॥
जन बुल्ला चरनन बलिहारी, जिन्ह यह गतिहिं सँवारी ॥ ३ ॥
तन मन धन चरनन पर वारी, जम से लियो सँभारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
निरगुन दयाल दानी मनहीं में जानी ।
ससि सूर एक आनि रैनि दिवस सानी ॥ १ ॥
बाजे अनहद सुनि भई है दिवानी ।
उलटि बहन लागो गंग जमुन पानी ॥ २ ॥
करि अस्नान हंसा धरत अधर ध्यानी ।
मिटि गयो आवा जानी भई है उज्जल खानी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला याही पदहिं समानी ।
मोच्छ मुक्ति भक्ति धुजा फहरानी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
बैरागी कौने बैराग घर लिया, जातें सर्ब त्याग तुम किया ॥ १ ॥
कित बैराग कितहि वे मुद्रा, कौने घाट रस पिया ॥ २ ॥
तन बैराग मनहिं मुद्रा, बंक नाल रस पिया ॥ ३ ॥
बुल्ला बैराग ब्रह्म बुद्धि, अचल अमर घर किया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
प्रान नाथ जी, सहजहिं प्याला पायो ॥ १ ॥
प्याला पिया सिखर गढ़ लीया, जोतिहिं जोति समायो ॥ २ ॥
तन कियो कुंड पवन कियो घोटना, छकि छकि अमी छकायो । ३ ॥
जन बुल्ला सतगुरु बलिहारी, नित यह अमल चढ़ायो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
राम नाम जपि उधरो रसना, राम नाम जपि उधरो ।
सब्द बिबेकी गगन निरेखी१, साध संगति से सुधरो ॥ १ ॥
(१) देख कर ।
२८ बुल्ला साहिब का शब्दसार
मूँदि के मदन जतन करु संजम, इहै ज्ञान कै मेला ।
निरगुन नाम निरंतर पेखी, तहाँ गुरु नहिं चेला ॥ २ ॥
विद्या बेद भेद नहिं जानो, जानो एक अकेला ।
आवै न जाय मरे नहिं जीवै, सो सतगुरु सत चेला ॥ ३ ॥
जो कछु कहौं कहत नहिं आवै, जौ रे कहौं तौ पेला१ ।
जन बुल्ला नामहिं को सेवक, अर्ध उर्ध मन खेला ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साँझ सुबह एकौ नहिं जान, धरि धरि लेइ चलावै बान ॥१॥
धनि वे पुरुष धनि वे नारी, आवागवन तें लिहल उबारी ॥२॥
यारी सतगुरु किया निगाह, जन बुल्लहिं ले चला बियाह ॥३॥
॥ शब्द ७ ॥
मैं कस राखौं पाँच नारि, बरज न मानै बड़ी खुवारि२ ॥१॥
जिन आपन घर किया उजारि३, कबहुँ न सुमिरहिं देव मुरारि ॥२॥
अबकी उजरे छाइ४ न जाइ, कासे कहौं यह गति बनाइ ॥३॥
मनुवाँ मकरी रहे समाइ, लै लै जात है संग लगाइ ॥४॥
भोग बिलास कि आस बनाइ, फिरिफिरि नरकहि माहिं समाइ ॥५॥
भला भयल मन चलल कोहाँइ५, बीचहिं में मिलिगे गुरुराय ॥६॥
हमरे हौ तुम सदा सहाय, जन बुल्ला तुम्हरी बलि जाय ॥७॥
॥ शब्द ८ ॥
सोहं हंसा लागलि डोर ।
सुरति निरति चढ़ मनुवाँ मोर ॥ १ ॥
झिलिमिलि झिलिमिलि त्रिकुटी ध्यान ।
जगमग जगमग गगन तान ॥ २ ॥
गह गह गह अनहद निसान ।
प्रान पुरुष तहँ रहत जान ॥ ३ ॥
(१) जबरदस्ती । (२) खराब । (३) उजाड़ । (४) छावना । (५) रूठना ।
मिश्रित २६
लहरि लहरि उठि पछिव १ घाट ।
फहरि फहरि चल उतर बाट ॥ ४ ॥
सेत बरन तहँ आवै आप ।
कह बुल्ला सोइ माइ बाप ॥ ५ ॥
॥ शब्द ६ ॥
होत भई बिन मोल कि बाँदी २ ।
अविगति ने मोहिं सहजहिं छाँदी ३ ॥ १ ॥
बिना दाम अब छूटब कैसे ।
राखहु अविगति जैसेहिं तैसे ॥ २ ॥
तन मन धन मेरो दाम दमइया ।
लेहुँ न अविगति अपनि दुहइया ४ ॥ ३ ॥
जन बुल्ला सरनागति अइया ।
बिना राम अब कवन छुड़इया ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
बैशागिनि मोरि हो, होउ जोगिनि के भेस ॥ टेक ॥
उहवाँ तें आइल सँदेसवा हो, सुनहु सखी पाँच नारि ॥ १ ॥
कुसल छेम तें चालहु हो, बहुरि न मिलि है मुरारि ॥ २ ॥
बदली रंग बिरँग है हो, भंग रंग केहि
३० बुल्ला साहिब का शब्दसार
।। शब्द १२ ।।
ऐसे मन रहु हरि के पास । सदा होय तोहि मुक्ति बास । १॥
जस धना१ सेन१ कबीरदास१। नामदेव१ रैदास१ दास ॥२॥
सदना१ पोपा१ कान्हादास१। यारीदास१ तहँ केसोदास१ ॥३॥
जिन हरि भक्ति महँ लियो निवास । जम जालिम की काटि फाँस ॥४॥
जुग जुग अचल प्रगास बास । जन बुल्ला की पुजलि आस ॥५॥
।। शब्द १३ ।।
नाथ हाजिरी मेरी लीजे, ता तें दफ्तर दाखिल कीजे ॥ टेक ॥
हौं अतीत२ गरीब सिपाही, वाहि रोज कछु दीजे ॥ १ ॥
दया धरम अरु ज्ञान ध्यान व्रत, येही अल्फा३ दीजे ॥ २ ॥
पाँच पचीस तीन मोवासी, वाहि तोरि गढ़ लीजे ॥ ३ ॥
जो जन हृदय बिचार दिखतु है, जन बुल्ला सहि कीजे ॥ ४ ॥
।। शब्द १४ ।।
यह जग जैसे सुपन है, सुनहु बचन परमान ॥ टेक ॥
यह माया जस डाइनी, हरहि लेति है प्रान ॥ १ ॥
पल पल छिन छिन ब्यापई, है जम दूत समान ॥ २ ॥
इत की आसा छोड़िये, भजि लीजे निजु नाम ॥ ३ ॥
उबरे कोई संत जन, जिन्ह सुमिरयो है नाम ॥ ४ ॥
जन बुल्ला सरनहिं तेरी, बेरी४ काटो राम ॥ ५ ॥
भव सागर तें उबारिये, दीजे अपनो धाम ॥ ६ ॥
।। शब्द १५ ।।
जिवन हमार सुफल भो हो, सइयाँ सुतल समीप ॥ टेक ॥
एक पलक नहिं बिछुरे हो, सांई मोर जिहीत५ ।
पुलकि पुलकि रति मानल हो, जानल परतीत ॥ १ ॥
मन पवना सेजासन हो, तिरबेनी तीर ।
हम धन तहवाँ बिराजल हो, लिहले रघुबीर ॥ २ ॥
(१) भक्तों के नाम। (२) यतीम, अनाथ। (३) अलिफी, मेखली। (४) बेड़ी।
(५) जीव-हित।
मिश्रित ३१
सुरति निरति ले जाइब हो, पाइब गुर रीति ।
बहुरि न यह जग आइब हो, गाइब निर्गुन गीति ॥ ३ ॥
जन बुल्ला घर छाइब हो, बारब तहँ जोति ।
अनहद डंक बजाइब हो, हानि कबहुँ न होति ॥ ४ ॥
।। शब्द १६ ।।
ऐसे हरि सरनी जो धावे ।
राम नाम निजु भजे जु प्रानी, जमदूत निकट न आवे ॥१॥
जैसे भुवँग निकाले मनि को, जुगति से भोग भुगावे ।
ऐसीही गति काया मद्धे, बिरला जन कोइ पावे ॥२॥
चलत फिरत पुहमी में टेढ़ो, माँद पईसत सीधो१ ।
जाइ के बैठो गगन भवन में, मनहीं मन से रीझो ॥३॥
सुरति निरति लै भवन से निकसे, भवसागर नहिं सोवे ।
जन बुल्ला वहि तत्त प्रगासी, आनँद मंगल गावे ॥४॥
।। शब्द १७ ।।
हरि नाम निसानी हो जानी ॥ १ ॥
जदि जानी तदि भइ है दिवानी, लोक कहै यह भरम भुलानी ॥२॥
जन बुल्ला की यही निसानी, सुरति निरति ले जोति समानी ॥३॥
।। शब्द १८ ।।
भाई इक सांई जग न्यारा है ॥ १ ॥
सो मुझ में मैं वाही माहीं, ज्यों जल मद्धे तारा है ॥ २ ॥
वा के रूप रेख काया नहिं, बिना सीस बिस्तारा है ॥ ३ ॥
अगम अपार अमर अबिनासी, सो संतन का प्यारा है ॥ ४ ॥
अनँत कला जाके लहरि उठतु है, परम तत्त निरकारा है ॥ ५ ॥
जन बुल्ला ब्रह्मज्ञान बोलतु है, सतगुरु सब्द अधारा है ॥ ६ ॥
(१) सर्प जमीन पर तो टेढ़ा चलता है मगर बाँबी में सीधा घुसता है ।