सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 36 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

२० बुल्ला साहिब का शब्दसार
( ३ )
होरी खेलो सतगुरु दयाल से ।
धन जोबन सपना करि जानो, मेलो जोति अपार से ॥१॥
होत अगाध अकास सब्द धुनि, सुनत रहो सुख चाह से ।
साहिब सुरति मुरति हिय लागी, केल करत हर हाल से ॥२॥
एक तान इक मान मनावै, एक ज्ञान इक ध्यान से ।
एक दसा इक भाव भक्ति लै, मिलो बुंद दरियाव से ॥३॥
अलख लखायो दरस दिखायो, खेलत फाग सुचाल से ।
जन बुल्ला ऐसी होरी खेले, उतरि गये भव जाल से ॥४॥
( ४ )
होरी खेलो रंग भरी, सब सखियन संग लगाई ॥ टेक ॥
फागुन आयो मास अनँद भो, खेलि लेहु नर नारी ॥ १ ॥
ऐसा समय बहुरि नहिं पैहो, जैहो जन्म जुवा हारी ॥ २ ॥
तीर त्रिबेनी होरी खेलो, अनहद डंक बजाई ॥ ३ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस तिनों जन, रहे चरन लिपटाई ॥ ४ ॥
बनि बनि आवैं दरस दिखावें, अद्भुत कला बनाई ॥ ५ ॥
जन बुल्ला ऐसि होरी खेले, रहे नाम लौ लाई ॥ ६ ॥
( ५ )
निर्गुन बसंत को सुनहु भाव । दूजा अवरि न मोहिं चाव । १॥
हुलसी मनसा फलसी डाल । वा की साखा सर्ग पताल ॥२॥
बिना मूल अस्थूल आहि । वाकी पटतर लाउँ काहि१ ॥३॥
ज्ञान ध्यान बसि भयो मोर । तन से भागे सबहि चोर ॥४॥
दसौ दिसा में भयो सोर । बुल्ला सेवक प्रभू तोर ॥५॥
॥ शब्द ६ ॥
हौं खेलत फाग सुहावन, हरि आये मन भावन ॥१॥
जब तें कृपा कियो आ जन पर, मोच्छ मुक्ति फल पावन ॥२॥
(१) किस को ।