बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमिश्रित २७
मन को मारि मूँदो नव द्वारी, जीतो पाँचो नारी ॥ १ ॥
परम तत्त निरंकार ध्यान धरि, बहुरि नहीं अवतारी ॥ २ ॥
जन बुल्ला चरनन बलिहारी, जिन्ह यह गतिहिं सँवारी ॥ ३ ॥
तन मन धन चरनन पर वारी, जम से लियो सँभारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
निरगुन दयाल दानी मनहीं में जानी ।
ससि सूर एक आनि रैनि दिवस सानी ॥ १ ॥
बाजे अनहद सुनि भई है दिवानी ।
उलटि बहन लागो गंग जमुन पानी ॥ २ ॥
करि अस्नान हंसा धरत अधर ध्यानी ।
मिटि गयो आवा जानी भई है उज्जल खानी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला याही पदहिं समानी ।
मोच्छ मुक्ति भक्ति धुजा फहरानी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
बैरागी कौने बैराग घर लिया, जातें सर्ब त्याग तुम किया ॥ १ ॥
कित बैराग कितहि वे मुद्रा, कौने घाट रस पिया ॥ २ ॥
तन बैराग मनहिं मुद्रा, बंक नाल रस पिया ॥ ३ ॥
बुल्ला बैराग ब्रह्म बुद्धि, अचल अमर घर किया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
प्रान नाथ जी, सहजहिं प्याला पायो ॥ १ ॥
प्याला पिया सिखर गढ़ लीया, जोतिहिं जोति समायो ॥ २ ॥
तन कियो कुंड पवन कियो घोटना, छकि छकि अमी छकायो । ३ ॥
जन बुल्ला सतगुरु बलिहारी, नित यह अमल चढ़ायो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
राम नाम जपि उधरो रसना, राम नाम जपि उधरो ।
सब्द बिबेकी गगन निरेखी१, साध संगति से सुधरो ॥ १ ॥
(१) देख कर ।