बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतहँ मिलै बिरही हंस जन कोउ, अगम दियो है लखाय ॥ ६ ॥
तहँ दास बुल्ला कियो संगति, रह्यो चरन समाय ॥ ७ ॥
( २ )
सतगुरु नावल अधर हिंडोलना ।
हम धन झुलब सुघर हिंडोलना ॥ १ ॥
झुलत झुलत गइलुँ गगनहिं तटना ।
तहवाँ साधन को अखरना१ ॥ २ ॥
सेत सुहावन जगमग देखलना ।
तहवाँ प्रान हमार समैलना२ ॥ ३ ॥
अब कि समैले फिर न अइबना३ ।
जन बुल्ला गावल निर्गुन हिंडोलना ॥ ४ ॥
बसंत और होली
( १ )
मन बसंत खेले अगम फाग, चरन कमल अनुराग जाग ॥१॥
खेले ब्रह्मा औ महादेव, खेले नारद औ जैदेव ॥२॥
खेले ध्रुव प्रहलाद जानि, खेले सुकदेव भक्ति मानि ॥३॥
हनुमत खेले सेवक होय, अरजुन खेले गति बिलोय४ ॥४॥
सहदेव खेले अगम गाय, परम जोति में रहे समाय ॥५॥
खेले नाभा औ कबीर, खेले नानक बड़े धीर ॥६॥
दसम द्वार पर दरस होय, जन बुल्ला देखे आपु सोय ॥७॥
( २ )
हरि हम देख्यो नैनन बीच, तहाँ बसंत धमारि कीच ॥१॥
आदि अंत मधि बन्यो बनाय, निरगुन सरगुन दोनों भाय५ ॥२॥
चीन्हेव तिन्हको लियो लगाय, अनबूझो रहि गो मुँह बाय ॥३॥
सुन्न भवन मन रह्यो समाय, तहँ ऊठत लहरि अनंत आय ॥४॥
जगमग जगमग है अँजोर, जन बुल्ला है सेवक तोर ॥५॥
(१) अखाड़ा । (२) समाया । (३) आना । (४) मथ कर । (५) भाव ।