बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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दास बुल्ला कहै अगम गति तब लहै,
गुरु के बचन से अचल घर लहा है ॥ ४ ॥
( ८ )
जिन से अब जोग जुगति बनि आयो,
अरध उरध तिरबेनी न्हाई ॥ १ ॥
सब पाप जु दोष बहाय दियो,
हरि नाम निरंजन परी दुहाई ॥ २ ॥
दूसरो न अवर है यहि कलि में,
जिन तिहुँ लोक रचि रच्यो बनाई ॥ ३ ॥
बुल्ला हिरदय बिचारि बोलै,
गुरु ज्ञान आध्यातम¹ देखो भाई ॥ ४ ॥
( ६ )
आँधरे ने देखो हाथी साथी सब भूलि गयो,
फूलो ब्रह्म जैसे रबि ससि सुहाई है ॥ १ ॥
सोई मूल सोई स्थूल सोई फूल फूलि रह्यो,
सोई जुग जुग देखो आपु रूप वोई है ॥ २ ॥
आदि अंत मद्ध वोई नीके करि देखो जोई,
सोई त्रिभुवन नाथ बूझै गति कोई है ॥ ३ ॥
गुरु गम होय बोलै नेकु नाहीं चित्त डोलै,
जन बुल्ला निज घर सहज समोई है ॥ ४ ॥
अरिल छन्द
( १ )
कोटि भुलै ध्रुव ज्ञान हिये नहिं आइया ।
राम नाम को ध्यान धरो मन लाइया ॥
बिना ध्यान नहिं मुक्ति पिछे पछिताइया ।
बुल्ला हृदय बिचारि राम गुन गाइया ॥
(१) अध्यात्म रामायण ।