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बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

रेखता २१
बाजत ताल मृदंग डफ्फ सुर, सरस१ राग सुर गावन ॥ ३ ॥
देत दान तन मन न्योछावरि, भाँवरि संत सुभावन ॥ ४ ॥
जन बुल्ला ऐसी होरी खेलो, अद्भुत कला समावन ॥ ५ ॥
भूलना
( १ )
जहँ आदि न अंत न मद्ध है रे, जहँ अलख निरंजन है भेला ॥ १॥
जहँ बेद कितेब न भेद है रे, नहिं हिन्दू तुरुक न गुरु चेला ॥२॥
जहँ जीवन मरन न हानि है रे, अगम अपार में जाय खेला ॥३॥
बुल्ला दास अतीत यों बोलई, यारी सतगुरु सत सब्द देला ॥४॥
( २ )
प्रेम हिंडोलना भूलना रे, जहँ अलख धनी की मौज घनी ॥१॥
तहँ वार पार दरियाव नहीं, नाहीं आवन नाहीं जानी ॥२॥
अचल अमर घर बैठि के रे, मगन भयो नहिं ख्याल अपनी । ३॥
बुल्ला दास अतीत यों बोलै, उलटि कँवल गगन आनी ॥४॥
रेखता
( १ )
प्रीति की रीति से जीति मैदाँ लिया,
पवन के घोरा२ से जोरा जाय किया है ॥ १ ॥
पाँच अरु तीन पच्चीस को बसि किया,
साहिब को ध्यान धरि ज्ञान रस पिया है ॥ २ ॥
तहँ भूख औ प्यास नहिं आस औ बास नहिं,
एक साहिब से ब्रह्म जाय थिया३ है ॥ ३ ॥
दास बुल्ला कहै अगम गति तौ लहै,
तोरि के कुफुर तब गगन गढ़ लिया है ॥ ४ ॥
(१) रसीला। (२) घोड़ा। (३) स्थिर हुआ।

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