बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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सुरति निरति ले जाइब हो, पाइब गुर रीति ।
बहुरि न यह जग आइब हो, गाइब निर्गुन गीति ॥ ३ ॥
जन बुल्ला घर छाइब हो, बारब तहँ जोति ।
अनहद डंक बजाइब हो, हानि कबहुँ न होति ॥ ४ ॥
।। शब्द १६ ।।
ऐसे हरि सरनी जो धावे ।
राम नाम निजु भजे जु प्रानी, जमदूत निकट न आवे ॥१॥
जैसे भुवँग निकाले मनि को, जुगति से भोग भुगावे ।
ऐसीही गति काया मद्धे, बिरला जन कोइ पावे ॥२॥
चलत फिरत पुहमी में टेढ़ो, माँद पईसत सीधो१ ।
जाइ के बैठो गगन भवन में, मनहीं मन से रीझो ॥३॥
सुरति निरति लै भवन से निकसे, भवसागर नहिं सोवे ।
जन बुल्ला वहि तत्त प्रगासी, आनँद मंगल गावे ॥४॥
।। शब्द १७ ।।
हरि नाम निसानी हो जानी ॥ १ ॥
जदि जानी तदि भइ है दिवानी, लोक कहै यह भरम भुलानी ॥२॥
जन बुल्ला की यही निसानी, सुरति निरति ले जोति समानी ॥३॥
।। शब्द १८ ।।
भाई इक सांई जग न्यारा है ॥ १ ॥
सो मुझ में मैं वाही माहीं, ज्यों जल मद्धे तारा है ॥ २ ॥
वा के रूप रेख काया नहिं, बिना सीस बिस्तारा है ॥ ३ ॥
अगम अपार अमर अबिनासी, सो संतन का प्यारा है ॥ ४ ॥
अनँत कला जाके लहरि उठतु है, परम तत्त निरकारा है ॥ ५ ॥
जन बुल्ला ब्रह्मज्ञान बोलतु है, सतगुरु सब्द अधारा है ॥ ६ ॥
(१) सर्प जमीन पर तो टेढ़ा चलता है मगर बाँबी में सीधा घुसता है ।