बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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उनमुनि मुद्रा लगी समाधी । रबि ससि पवनहिं राखो बाँधी ॥३॥
चाचरि मुद्रा से प्रीति लगावो । भूचरि मुद्रा से प्रेम बढ़ावो ॥४॥
अगोचरि मुद्रा से आन भुगावो । खेचरि मुद्रा से दरस दिखावो॥५॥
जो पंडित तैं करु पंडिताई । चरन रेनु हिरदे लै लाई ॥६॥
चरन रेनु का करहु जनेवा । तौ तू पंडित पावहु भेवा ॥७॥
जो यह अचरज देइ बुझाई । सोई सतगुरु अगम कहाई ॥८॥
अगम जोति का धारै ध्यान । बुल्ला बोलहि सब्द निदान ॥६॥
॥ शब्द ३ ॥
राम राय लावल फुलवारी ॥ टेक ॥
मूल सींचि के बाग लगाया । कलियाँ भई तबहिं चुनवाया ॥१॥
एक फूल ते अनेक कहाय । फूल भरी भरि रहि कुम्हिलाय ॥२॥
काहू फूल क मरम न पाया । सरगुन मद्धे रहल समाया ॥३॥
जन बुल्ला सतगुरु बलिहारी । सेत फूल जिन लिहल बिचारी॥४॥
॥ शब्द ४ ॥
मोर सुमति भइल, मन जतन बिसारी रे ॥ टेक ॥
मूरहिं बाँधी सूरहिं१ साधी, पच्छिम बिचारी रे ॥ १ ॥
लोभ मोह अरु माया छाया, भरमन सब टारी रे ॥ २ ॥
छूटी माया तन पाया छाया, ब्रह्म की जोती रे ॥ ३ ॥
जन बुल्ला जोगी बोलहि, निझर भरै जहँ मोती रे ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
आनँद उदित अखंडित सोहं, मानो गगनद्वार गति जोहं ॥१॥
सिद्धी मूलि मूल मति पावन, जामन पवनहिं उलटि जमावन॥२॥
अर्ध उर्व के मद्ध निरंतर, जगमग जगमग जोति जगावन ॥३॥
देखि दिखावै कहावै अकेला, मेला अलख पुरुष सँग खेला ॥४॥
जन बुल्ला याही बिधि खेला, अनहद डंक निसंक को देला ॥५॥
(१) स्वर ।