बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं सन्त-परिचय
बुल्ला साहेब का शब्दसार
[ जीवन-चरित्र सहित ]
[ कोई साहिब बिना प्रकाशक की इजाजत लिये इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स
इलाहाबाद
[ १६७७ ] [ मूल्य १॥- ]
प्रहलाद चरित चौपाई
[ तृतीयावृत्ति ]
(पुस्तकालय पॉकेट पर अंकित विवरण / Library Pocket text)
Centre for the Study of
Developing Societies
29, Rajpur Road,
DELHI - 110 054.
बुल्ला साहिब का शब्दसार
[ जीवन-चरित्र सहित ]
—: ० :—
जिसमें उन महात्मा के चुने हुए शब्द
छपे हैं और गूढ़ शब्दों के
अर्थ फुट-नोट में
लिखे हैं।
—: * :—
[ All Rights Reserved ]
[ कोई साहिब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स,
इलाहाबाद
[ पांचवीं बार ] अगस्त, १६७६ [ मूल्य २)
Printed at The Belvedere Printing Works, Allahabad, By Sheel Mohan.
जीवन-चरित्र
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बुल्ला साहिब यारी साहिब के गुरुमुख चेले और जगजीवन साहिब व गुलाल
साहिब के गुरु थे। यह जाति के कुनबी थे और असल नाम इनका बुलाकीराम था।
इन्होंने भुरकुड़ा गाँव जिला गाजीपुर में अपना सतसंग कायम किया जहाँ इनके बाद
गुलाल साहिब और भीखा साहिब भी सतसंग कराते रहे और अब तक वहाँ तीनों
की समाधें मौजूद हैं। इनके जीवन का समय विक्रमी सम्बत् १७५० और १८२५ के
बीच जान पड़ता है।
जैसा कि गुलाल साहिब के जीवन-चरित्र में लिखा गया है बुल्ला साहिब पहले
गुलाल साहिब के नौकर थे और हल चलाने के काम पर तैनात थे। बुल्ला साहिब जब
किसी काम को जाते तो भजन ध्यान में लग जाने से अक्सर देर कर देते थे। इनकी
सुस्ती की शिकायत लोगों ने गुलाल साहिब से की और गुलाल साहिब कई बार इन
पर खफा हुए। एक दिन का जिक्र है कि बुल्ला साहिब हल चलाने को गये थे और वहाँ
भगवंत के ध्यान और मानसी साध सेवा म लग गये। उसी समय गुलाल साहिब मौके
पर पहुँच गये और बैलों को हल के साथ फिरते और बुल्ला साहिब को खेत की मेड़ पर
आँख बंद किये हुए बैठा देखकर समझे कि वह औंध रहे हैं और क्रोध में भरकर एक
लात मारी। बुल्ला साहिब एकबारगी चौंक उठे और उनके हाथ से दही छलक पड़ा।
यह कौतुक देखकर गुलाल साहिब हक्के-बक्के हो गये क्योंकि पहले उन्होंने बुल्ला साहिब
के हाय में दही नहीं देखा था। पर बुल्ला साहिब बड़ी आधीनता से गुलाल साहिब से
बोले कि मेरा अपराध छमा करो मैं साधुओं की सेवा में लग गया था और भोजन
परोस चुका था केवल दही बाकी था उसे परोस ही रहा था जो आपके हिला देने से
हाथ से गिर गया। यह गति अपने नौकर की देख कर गुलाल साहिब चरणों पर गिरे
और उनको अपना गुरु धारन किया।
बुल्ला साहिब सुरत शब्द अभ्यासी थे जिनकी ऊँची गति और भारी महिमा उनकी
बानी से प्रगट होती है।
नीचे दी हुई वंशावली से उनके गुरु घराने का हाल जान पड़ता है।
बावरी साहिब (दिल्ली)
।
बीरू साहिब
।
यारी साहिब
।
बुल्ला साहिब (भुरकुड़ा, जिला गाजीपुर)
।
गुलाल साहिब
।
भीखा साहिब
बुल्ला साहिब का शब्दसार
गुरु और नाम महिमा
॥ शब्द १ ॥
धन्न धन्न गुरुदेव जो यह गति लाइया ।
परम जोति निरंकार ताहि गुन गाइया ॥ १ ॥
मिलि जुरि सखी सहेलरि चउक पुराइया ।
अर्ध उर्ध अरु मद्द तो कलस धराइया ॥ २ ॥
तिरगुन गुन करि तेल काया तन जारिया ।
अष्ट जाम बरै जोति कबहुँ न बुझाइया ॥ ३ ॥
ऐसो अद्भुत रंग साध जन रंगिया ।
बुल्ला सोभा धाम ताहि अंग अंगिया१ ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
सुखमनि सुरति डोरि बनाव ।
मेटि है सब कर्म जिय के, बहुरि इतहिं न आव ॥ १ ॥
पैठि अंदर देखु कंदर२, जहाँ जिय को बास ।
उलटि प्रान अपान मेटो, सेत सब्द निवास ॥ २ ॥
गंग जमुना मिलि सरस्वति, उमँगि सिखर बहाव ।
लवकंति३ बिजुली दामिनी, अनहद गरज सुनाव ॥ ३ ॥
जोति आया आपहीं, गुरु यारि सब्द सुनाव ।
तब दास बुल्ला भक्ति ठानो, सदा रामहिं गाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
सांई के नाम की बलि जावँ ।
सुमिरत नाम बहुत सुख पायो, अंत कतहूँ नहिं ठावँ ॥ १ ॥
नाम बिना मन स्वान मंजारी४, घर घर चित लै जावँ ॥ २ ॥
(१) पहिना । (२) गुफा । (३) चमकता है । (४) कुत्ता बिल्ली ।
४ बुल्ला साहिब का शब्दसार
बिन दरसन परसन मन कैसो, ज्यों लूले को गाँव१ ॥ ३ ॥
पवन मथानी हिरदै ढूँढ़ो, तब पावै मन ठावँ ॥ ४ ॥
जन बुल्ला बोलहि कर जोरै, सतगुरु चरन समावँ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
प्रभु निराधार अधार उज्ज्वल, बिन्दु सकल बिराजई ।
अनन्त रूप सरूप तेरो, मो पै बरनि न जावई ॥ १ ॥
बाँधि पवनहिं साधि गगनहिं, गरजि गरजि सुनावई ।
तहँ हंस मुनि जन चूगते मनि, रस परसि परसि अघावई ॥ २ ॥
बिना कर मुख बेनु२ बाजै, बीन स्रवनन गुंजई ।
बिना नैनन दरस देखो, अगति गतिहिं जनावई ॥ ३ ॥
वा के जाति पाँति न नेम धर्मा, भर्म सकल गँवावई ।
आपु आपु बिचारि देखो, ऐसो है वह रवई३ ॥ ४ ॥
जीति पाँच पचीस तीनों, चौथे जा ठहरावई ।
तब दास बुल्ला लियो गढ़, जब गुरु दीन्ह लखावई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५ ॥
निसु दिन गगन निरेखो जाय ।
छोड़ि दे बहु बात बिषया, मगन है गुन गाय ॥ १ ॥
तिरकुटी जहँ बसत संगम, गंग जमुन बहाय ।
बरत झिलमिलि होत जगमग, तहाँ रहु अरुझाय ॥ २ ॥
सुन्न के मनि भवन में, तहँ ध्यान रहु ठहराय ।
खोजि ले निज बस्तु अपनी, सकल घट रहि छाय ॥ ३ ॥
तीन लोक में गम्म४ जा के, द्वार सेवा लाय ।
जन बुल्ला कहि अगम मेला, बिरल जन कोइ पाय ॥ ४ ॥
(१) जिस तरह लूला अपने पैरों से चल कर गाँव (मुकाम) को नहीं पहुँच सकता
इसी तरह बिना नाम के दरस परस के मन की हालत है यानी अंतर में चाल नहीं चलती ।
(२) एक लम्बा बाजा जो मुँह से बजाया जाता है । (३) राजा । (४) गति ।
गुरु और नाम महिमा ५
॥ शब्द ६ ॥
समुझ मन मानि ले, जोगिया कहल सँदेस ।
रैनि दिवस रबि ससि वहँ नाहीं, तहवाँ कर उपदेस ॥ १ ॥
जटा भभूत बैराग जोग तप, यह तौ जोगिया न भाय ।
सुन्न निरंतर जोगी बोलै, आपा उलटि समाय ॥ २ ॥
आपै जोगी आपै भोगी, आपै सर्ब समान ।
वा जोगिया के दरस परस पर, किया सीस कुरबान ॥ ३ ॥
गगन मँडल अनहद धुनि बाजै, तहँ जोगिया कै फेर ।
कह जन बुल्ला वा जोगी बर, सत्त सब्द कै चेर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मन तुम सतगुरु चरन समाजी । अविगति गति ब्रह्म बिराजी ॥टेक॥
अचरज दियना बरो अधर में, प्रेम जोति छबि छाजी ॥ १ ॥
धरनि अकास तहाँ नहिं दीखत, अगम पुरुष इक गाजी ॥ २ ॥
आवै न जाइ मरै नहिं जीवै, अनहद धुनि तहँ बाजी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला जानो वहि बीरा१, (जो) उलटि पवन घर साजी॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
मन बैरागी हो, प्रभु गति लखहिं न कोई ॥ टेक ॥
ले कुंभक पूरक घर रखना, रेचक संजम देई ।
त्राटक२ ताड़ी लगलि केवारी, राम नाम जपि लेई ॥ १ ॥
आगे सुन्न अगम गति लीला, निरखि ध्यान धरि देख ।
जगमग जगमग जोति जगमगै, आपुहिं अलख अलेख ॥ २ ॥
आदि ब्रह्म सदा अबिनासी, बासी अगम अपार ।
आवै न जाय मरै नहिं जीवै, सदा रहै इक तार ॥ ३ ॥
अद्भुत बुंद समूह पुरुष से, तहाँ रह्यो मन छाई ।
जन बुल्ला बलि बलि सतगुरु की, जिन यह पंथ लखाई ॥ ४ ॥
(१) बहादुर । (२) तीन गुन जो अटकाने वाले हैं ।
६ बुल्ला साहिब का शब्दसार
॥ शब्द ६ ॥
मातल मनुवाँ घटहिं समैबों हो ॥ टेक ॥
जौने गैलै संतै गैलें¹, तौने जइबों हो ।
सहज सरूपै लिहले, हरि गुन गइबों हो ॥ १ ॥
तीरथ तिरबेनी नहइबों, गगन में जइबों हो ।
अनहद धुनि सुनि, दीपक बरइबों हो ॥ २ ॥
बारि दीया देखो हीया, सुन² उँजियारो हो ।
यारी सतगुरु पूरो, निज भेदहिं सारो हो ॥ ३ ॥
देखि दरस मन तनहिं, छाड़ि दीया हो ।
जन बुल्ला बानी बोलै, मरि फिरि जीया हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
अनहद ताल दग थेइ थेइ बाजै, सकल भुवन जा की जोति बिराजै॥१॥
ब्रह्मा बिस्नु खड़े सिव द्वारे, परम जोति सो करहिं जुहारे ॥२॥
गगन मँडल महँ निर्तन होय, सतगुरु मिलै तो देखै सोय ॥३॥
आठ पहर जन बुल्ला गाजै, भक्ति भाव माथे पर छाजै ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
जियरा तू जीवन जनम सुधारो, तातें भवसागर से तारो ॥टेक॥
परखि परखि तिरबेनी संगम, झिलमिलि जोति सितारो⁴ ॥१॥
उनमुनि लागो बंद सहज धुनि, जगमग जोति पसारो ॥२॥
जन बुल्ला सदा हुसियारो, सतगुरु सब्द बिचारो ॥३॥
निर्गुन नाम निरंतर पेखो, जीतो मन भय मारो ॥४॥
॥ शब्द १२ ॥
गुरु नाम मिलो सच पाया है ।
बिसरी देह गेह सुख संपति, जोतिहिं जोति समाया है ॥ १ ॥
जोतो नगर नवो दर मूँदो, ब्रह्म अगिन तन लाया है ।
दसवें द्वार कै ताला खोलो, गगन मँडल मठ छाया है ॥ २ ॥
(१) जिस मार्ग से संत गये । (२) सुन्न । (३) बंदगी । (४) तारा ।
चेतावनी ७
जहँ नहिं अवन गवन कै चिंता, अनँद भयो घर आया है ।
संत साध मिलि खेलन लागे, दरसन को फल पाया है ॥ ३ ॥
सतगुरु मो को अलख लखाया, आदि अंत इक साया१ है ।
जन बुल्ला याही बिधि खेलो, तब अवधूत कहाया है ॥ ४ ॥
चेतावनी
।। शब्द १ ।।
बटोही खोजहु क्यों नहिं आप । सुमिरहु अजपा जाप ॥टेक॥
बिन खोजे कहुँ रह न पैहौ, कोटिन करहु बिलाप ॥ १ ॥
निकटहिं राम नाम अभि अंतर, जानहिं जाहि मिलाप ॥ २ ॥
हाजिर हजूर त्रिबेनी संगम, झिलिमिलि नूर जो जाप ॥ ३ ॥
जन बुल्ला महबूब नूर में, यारी पीर२ प्रताप ॥ ४ ॥
।। शब्द २ ।।
धन कुलवंती जिन जानल अपना नाह३ ॥टेक॥
जेकरे हेतू४ ये जग छोड़्यो, सो दहुँ कैसन बाट५ ।
रैन दिवस लव लाइ रहो है, हृदय निहारत बाट ॥ १ ॥
साध संगति मिलि बेड़ा बाँधल, भवजल उतरब पार ।
अबकी गवने बहुरि नहिं अवने, परखि परखि टकसार ॥ २ ॥
यारीदास परम गुरु मेरे, बेड़ा दिहल लखाय ।
जन बुल्ला चरनन बलिहारी, आनँद मंगल गाय ॥ ३ ॥
।। शब्द ३ ।।
उतहीं रहौ इतै जनि आव । निरगुन स्वामी से मन लाव ॥१॥
जनम मरन कै संस मिटाव । इत उत मन कहुँ नाहिं चलाव ॥२॥
जो जन गगन मँडल घर छाव । ता का आवागवन नसाव ॥३॥
यारी सतगुरु दिया लखाव । बुल्ला निरखि परम पद पाव ॥४॥
।। शब्द ४ ।।
हो नर हरिहिं हिये नहिं जाना । तौ का समुझि परै ब्रह्मज्ञाना ॥टेक॥
(१) एक सा । (२) गुरु । (३) पति । (४) जिसके वास्ते । (५) वह न जानें कैसा है ।
८ बुल्ला साहिब का शब्दसार
करहि सिद्धि आसा गँठियाये, ता पर करत गुमाना ॥ १ ॥
आतम राम न नीके जानै, चौरासी लपटाना ॥ २ ॥
दूध पियाय रिझाय राखि मन, भाखहि बेद पुराना ॥ ३ ॥
कहत फिरै हम सब से ऊपर, भूलो फिरत दिवाना ॥ ४ ॥
बीज एक अंकुर है एकै, फल फुल रहत समाना ॥ ५ ॥
उपजत बिनसत होत हैं केते, अंत केहू नहिं आना ॥ ६ ॥
नाम प्रताप की महिमा सुनिये, तीन लोक धरि ध्याना ॥ ७ ॥
जन बुल्ला रामहिं को सेवक, बोलहिं सब्द निधाना ॥ ८ ॥
॥ शब्द ५ ॥
दया बिनु छार सकल माया, कबहौं राम नाम नहिं आया ॥टेक॥
पोखरा खनावहिं¹ बाग लगावहिं, पावहिं मन माया ॥ १ ॥
आतम राम न नीके जानहिं, ज्यों आया त्यों जाया² ॥ २ ॥
समुझि न परहि साध को मारग, जिन हरि नामहिं गाया ॥ ३ ॥
जन बुल्ला रामहिं को सेवक, मिथ्या जानहि माया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
जीवन जनम सुधारन देह ।
देह छोड़ि बिदेह होना, अचल पद यहि लेह ॥ १ ॥
काको माता पिता काको, काको सुत बित देह ।
जीवतही का नात इनका, मुए काको केह ॥ २ ॥
देह धरि के राम कृस्नहुँ, जगत आनि बड़ेह ।
पारब्रह्म को सुमिरन करिकै, जोतिहिं जोति मिलेह ॥ ३ ॥
जानि कै अनजान होइये, पूजिये ब्रह्म नेह ।
दास बुल्ला बानि बोले, काल के मुख खेह³ ॥ ४ ॥
प्रेम
॥ शब्द १ ॥
साची भक्ति गुपाल की, मेरो मन माना ।
मनसा बाचा कर्मना, सुनु संत सुजाना ॥ १ ॥
(१) तालाब खोदाते हैं । (२) चला गया । (३) धूल ।