बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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मूँदि के मदन जतन करु संजम, इहै ज्ञान कै मेला ।
निरगुन नाम निरंतर पेखी, तहाँ गुरु नहिं चेला ॥ २ ॥
विद्या बेद भेद नहिं जानो, जानो एक अकेला ।
आवै न जाय मरे नहिं जीवै, सो सतगुरु सत चेला ॥ ३ ॥
जो कछु कहौं कहत नहिं आवै, जौ रे कहौं तौ पेला१ ।
जन बुल्ला नामहिं को सेवक, अर्ध उर्ध मन खेला ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
साँझ सुबह एकौ नहिं जान, धरि धरि लेइ चलावै बान ॥१॥
धनि वे पुरुष धनि वे नारी, आवागवन तें लिहल उबारी ॥२॥
यारी सतगुरु किया निगाह, जन बुल्लहिं ले चला बियाह ॥३॥
॥ शब्द ७ ॥
मैं कस राखौं पाँच नारि, बरज न मानै बड़ी खुवारि२ ॥१॥
जिन आपन घर किया उजारि३, कबहुँ न सुमिरहिं देव मुरारि ॥२॥
अबकी उजरे छाइ४ न जाइ, कासे कहौं यह गति बनाइ ॥३॥
मनुवाँ मकरी रहे समाइ, लै लै जात है संग लगाइ ॥४॥
भोग बिलास कि आस बनाइ, फिरिफिरि नरकहि माहिं समाइ ॥५॥
भला भयल मन चलल कोहाँइ५, बीचहिं में मिलिगे गुरुराय ॥६॥
हमरे हौ तुम सदा सहाय, जन बुल्ला तुम्हरी बलि जाय ॥७॥
॥ शब्द ८ ॥
सोहं हंसा लागलि डोर ।
सुरति निरति चढ़ मनुवाँ मोर ॥ १ ॥
झिलिमिलि झिलिमिलि त्रिकुटी ध्यान ।
जगमग जगमग गगन तान ॥ २ ॥
गह गह गह अनहद निसान ।
प्रान पुरुष तहँ रहत जान ॥ ३ ॥
(१) जबरदस्ती । (२) खराब । (३) उजाड़ । (४) छावना । (५) रूठना ।