बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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पाँच पचीस तिन¹ लादि आपु में बैठि के ।
बुल्ला दीन्हो हाँकि जोति में पैठि के ॥
( ८ )
क्या भयो ध्यान के किये हाथ मन ना हुआ ।
माला तिलक बनाय देत सब को दुआ² ॥
आसा लागा डोरी कहत भला हुआ ।
बुल्ला कहै बिचारि झूठ सेमर धुआ³ ॥
( ९ )
का भयो सब्द के कहे बहुत करि ज्ञान दे ।
मन परतीत नहीं तो कहा जम जान दे⁴ ॥
का भयो तीरथ किये हिये नहिं आवई ।
बुल्ला कहै बिचारि खाली सब जावई ॥
( १० )
मन माने की बात बहुरि नहिं बोलना ।
अबिनासी से प्रीति कबहुँ नहिं डोलना ॥
बनि आई मोरी प्रीति तो आतम राम से ।
बुल्ला नैनन देखि बैठु आराम से ॥
( ११ )
सनमुख धारै ध्यान तो कर्म नसावई ।
निर्गुन जपै अपार परम पद पावई ॥
तन छूटे गति होइ बहुरि नहिं आवई ।
बुल्ला हृदय बिचारि बोलि हरि भावई ॥
मिश्रित
॥ शब्द १ ॥
जन कहँ समुझि परी यहि बारी, दीयो सब्द बिचारी ॥ टेक ॥
(१) तीन । (२) आसीस । (३ सेमर की टोंटी में सुवा फल की आस करके चोंच
मारता है परन्तु उससे धुआ यानी रुई निकलती है । (४) शब्द भजन के गाने और ज्ञान
उपदेश करने से क्या होगा, जब कि मन में प्रतीत नहीं है तो जमराज कैसे जाने देगा ।