भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
शब्दवर्णन । ४०७
सतसंगतिके निकट न आवै जोहै ठाट तरनको ॥
यमकिंकर जब आनि गहैंगे तब ना धीर धरनको ।
गुरु शुकदेव सहाय करेंगे आसरो दास चरनको ॥
राग केदारा ॥
सो मेरो कहो मानरे भाई ।
ज्ञान गुरूको राख हिये में बंध कटि जाई ॥
बालपनते खेलि खोयो गई तरुणाई ।
चेत अजहूँ भली बरहै जराहूं आई ॥
जिनके कारण बिमुख हरिते फिरत भटकाई ।
कुटुम्ब सबही सुख के लोभी तेरे दुखदाई ॥
साधु पदवी धारणाधर छांड़ कुटिलाई ।
वासना तजि भोग जगके होय मुकताई ॥
बहुरि योनी नाहिं आवै परमपद पाई ।
चरणदास शुकदेवके घर आनँद अधिकाई ॥
भाईरे अवधि बीतीजात ।
अंजली जल घटत जैसे तारे ज्यों परभात ॥
श्वास पूंजी गांठि तेरे सो घटत दिन रात ।
साधु संगत पैंठ लागी ले लगै सोइ हाथ ॥
बड़ो सौदा हरि सँभारो सुमिरिलीजै प्रात ।
काम क्रोध दलाल ठगिया बणिजमत इनसाथ ॥
लोभ मोह बजाज छलिया लगैंहैं तेरि घात ।
शब्द गुरुको राखि हिरदय तौ दगा नहिं खात ॥
अपनी चतुराई बुधि पर मति फिरै इतरात ।
चरणदास शुकदेव चरण परश तजि कुलजात ॥
४०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
भाईरे स्वपन यह संसार ।
देह स्वप्ना जन्म स्वप्ना स्वपन कुल ब्योहार ॥
माय स्वप्ना बाप स्वप्ना स्वपन सुत अरु नारि ।
लाज स्वप्ना जाति स्वप्ना स्वपन अस्तुति गारि ॥
योग स्वप्ना भोग स्वप्ना कियो वेद निषेद् ।
स्वप्न सो जो होय मिटि है स्वप्न सुख अरु खेद ॥
बन्ध स्वप्ना मुक्ति स्वप्ना स्वप्न ज्ञान विचार ।
स्वपन है सो बिनशि जैहै रहैगो ततसार ॥
चरणदास स्वप्ना ब्रह्म सांचो एक रस नित ज्ञान ।
सत्य स्वप्ना झूठ स्वप्ना कहाकरूं निर्बान ॥
भाई रे तजौ जग जंजाल ।
संग तेरे नाहिं चालै महल बाहन माल ॥
मात पितु सुत और नारी बोल मीठे बैन ।
डारि फांसी मोहकी तोहिं ठगत हैं दिनरैन ॥
छलधतूरो दियो सब मिलि लाज लड्डू माहिं ।
जान अपने कह भुलानो चेतता क्यों नाहि ॥
बाज जैसे चिड़ी ऊपर भँवत तोपर काल ।
मारतै गहि लै चलैंगे यम सरीखे साल ॥
सदा सँघाती हरि बिसारो जन्म दीन्हो हार ।
चरणदास शुकदेव कहिया समझ मूढ़ गंवार ॥
भाई रे समझ जग ब्योहार ।
जबताईं तेरे धन पराक्रम करै सबही प्यार ॥
अपने सुखको सबहि चाहैं मित्र सुत अरु नारि ।
इन्हौं तौ अपवश कियो है मोह बेड़ी डारि ॥
शब्दवर्णन । ४०६
सबन तोकों भय दिखायो लाज लकुटीमार ।
बाजीगर के बांदरा ज्यों फिरत घर घर द्वार ॥
जबै तोको बिपति आवै जरा कोर बिकार ।
तबै तोसूं लाज मानैं करैं ना तेरि सार ॥
इनकि संगति सदा दुख है समझ मूढ़ गवाँर ।
हरि प्रियतम को सुमिरिले कहैं चरणदास पुकार ॥
राग विहाग ॥
ये सब अप स्वारथ के गरजी ।
जगमें हेत न कीजै काहूसों अपने मनको बरजी ॥
रोपें फन्द घात बहु डारें इनते तू डरयेजी ।
हृदय कपट बाहर मिठबोलैं यह छल हैगो कहजी ॥
सौगँद खाय झूठ बहु बोलैं भवसागर कैसे तरजी ।
दुख सुख दर्द दया नहिं बूझें इनसे छुटावो हरिजी ॥
वैरी मित्र सबै चुनिदेखे दिलके महरम कहजी ।
इनको दोष कहा कह दीजै यह कलियुगकी झरजी ॥
दुनियाभगल कुटिलबहु खोटी देखिछातीमेरी लरजी ।
चरणदास इनको तजि दीजै चल बस अपने घरजी ॥
राग आसावरी ॥
साधो राम भजेते सुखिया ।
राजा परजा नेमी दाता सबही देखे दुखिया ॥
जो कोई धनवंत जगतमें राखत लाख हजारा ।
उनको तौ संशयहै निशिदिन घटत बढ़त व्योहारा ॥
जिनके बहुसुत नाती कहिये और कुटुँब परिवारा ।
वें तौ जीवन मरणके काजे भरतरहैं दुखभारा ॥
नेमी नेम करत दुख पावै कर अस्नान सबेरा ।
४१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दाताको देबेका दुखहै जब मँगतों ने घेरा ॥
चारि वरण में कोउ न देखो जाको चिन्ता नाहीं ।
हरि की भक्ति बिना सब दुख है समझ देख मनमाहीं ॥
सतसंगति अरु हरि सुमरणकरि शुकदेवा गुरु कहिया ।
चरणदास बिपता सब तजिकै आनँद में नित रहिया ॥
राग सारंग ॥
नर रामभजे सुख पाय है ।
दुख भाजैं अरु पातक नाशौ जौरा निकट न आयहै ॥
चेत सबेरे कहूं पुकारे नातरु तू पछितायहै ।
जगत ठाट सब ह्यांकी शोभा संग न कोई जायहै ॥
बिन गोपाल तुम्हारो को है हमको देहु बतायहै ।
पकरि बांधि यम मारनलागैं जब को होय सहायहै ॥
देखु बिचारि समुझु मनमाहीं तो बुधि जो अधिकायहै ।
तौ तू आव उलटि हरि सौंहीं चालो जनम सिरायहै ॥
चरणदास शुकदेव कहतहैं अब यह अधिक सयानहै ।
गुरुकी शरण साधुकी संगति प्रभुको कीजै ध्यानहै ॥
राग भैरव ॥
चेतौरे नर करौ विचार । छलरूपी है यह संसार ॥
स्वभा मात पिता सुतबंधू । स्वभा है सबही सम्बन्धू ॥
देखैकहै सुनैसो स्वपना । याजगमें नाहीं कोइ अपना ॥
स्वभा धरती और अकाशा । स्वभा चन्द्रसूर्य परकाशा ॥
स्वभा जलथल पावक पौन । स्वभा योग भोग अरु मौन ॥
स्वभा मायाको व्यवहार । स्वभा कुलनाता परिवार ॥
स्वभा देश नाम अरु भेश । स्वभा उत्पति परलय शेश ॥
शब्दवर्णन । ४११
स्वप्ना राजा रानाराव । स्वप्नै बानिक बन्यो बनाव ॥
स्वप्नै लरै मरै अरु भागै । स्वप्नै सोवै स्वप्नै जागै ॥
स्वप्नाहै यह सबही ठाट । उठी पैंठ जब मुंदिगइ हाट ॥
जो कछुहै सो सबही स्वप्ना । सांचाहरि हरि हरिहरिजपना ॥
क्यों भूला मूरख मस्तान । अजहूँ समुझि लेहिगुरुज्ञान ॥
गफलत छांड़ि भजौ हरिनाम । जो चाहै तू निश्चल धाम ॥
ज्योंसोवत स्वप्नोदरशाय । आंखिखुलै जबहीं मिटिजाय ॥
ऐसेही सब स्वपना जान । अचल अखण्ड रहै भगवान ॥
सबठाँ ब्रह्म रह्यो भरपूर । ना अति निकट नहीं बहुदूर ॥
जो कोइ खोजै सोई पावै । ततदरशी यह भेद बतावै ॥
गुरु शुकदेव पुकारि चितावै । झूठसांचको न्याव चुकावै ॥
चरणदास सब स्वपना जान । सदा एकरस ब्रह्म पिछान ॥
राग मलार ॥
सतगुरु भवसागर डरभारी ।
काम क्रोध मद लोभ भवँर जित लरजत नाव हमारी ॥
तृष्णा लहर उठत दिन राती लागत अति झकझोरा ।
ममता पवन अधिक डरपावै कांपतहै मनमोरा ॥
और महाडर नानाविधिके क्षण क्षणमें दुख पाऊं ।
अन्तरयामी बिनती सुनिये यह मैं अरज सुनाऊं ॥
गुरु शुकदेव सहाय करौ अब धीरज रहा न कोई ।
चरणदास को पार उतारो शरण तुम्हारी सोई ॥
राग बिलावल ॥
भक्ति गरीबी लीजिये तजिये अभिमाना ।
दो दिन जगमें जीवना आखीर मरजाना ॥
४१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पाप पुण्य लेखा लिखैं यम बैठे थाना ।
कह हिसाब तुम देहुगे जब जाहि दिवाना ॥
मात पिता कोइ ह्यां नहीं सबही बेगाना ।
द्रव्य जहां पहुँवै नहीं नहिं मीत पिछाना ॥
एकसों एकहि होयगी हां सांच तुलाना ।
काहूकी चालै नहीं छनै दूधरु पाना ॥
साहिबकी करि बन्दगी दे भूखे दाना ।
समझावैं शुकदेवजी चरणदास अयाना ॥
राग काफी ॥
घरी दोमें मेला बिछुरै साधो देखि तमाशा चलना
जे ह्यां आकर हुये इकट्ठे तिनसों बहुरि न मिलना ।
जैसे नाव नदी के ऊपर बाट बटेऊ आवैं ।
मिलि मिलि जुदेहोयँ पलमाहीं आप आपको जावैं ॥
या बारी बिच फूल घनेरे रंग सुगन्ध सुहावैं ।
लागैं खिलैं फेरि कुम्हिलावैं झरैं टूटि विनशावैं ॥
दारा सुत सम्पति को सुख ज्यों मोतीओस बिलावैं ।
ह्यांईं मिलैं और ह्यां नाशें ताको क्यों पछितावैं ॥
दै कुछ लै कुछ करिले करणी रहनी गहनी भारी ।
हरिसों नेह लगाय आपनो सो तेरो हितकारी ॥
सतसंगति को लाभ बड़ो है साध भक्त समुझावैं ।
चरणदास हो राम सुमिरिले गुरु शुकदेव बतावैं ॥
वह मेला सोइ भलाहै साधो जहँ सन्तों का भेला ।
जिनके रहै सदा हरिचरचा सुमिरैं राम सुहेला ॥
कथा कहैं अरु करें कीर्त्तन ज्ञान ध्यान समुझावैं ।
सोवत जागत बैठे चलते गोविंदके गुण गावैं ॥
शब्दवर्णन । ४१३
बोलैं अमृतवाणी सबसों कुमति कुबुद्धि छुटावैं ।
हरिकी भक्ति साधुकी संगति यह उपदेश बतावैं ॥
माला तिलक रामको बाना सुन्दर वेष बनावैं ।
घरघर होय आरती मंगल नवधासों चितलावै ॥
निशिदिन आनँदरूप दिवाली सदा वसन्त सोहायो ।
प्रेम महोत्सव नितही उत्सव सबै ठाट मनभायो ॥
या बिधि सों मन मगनहोय करि भजन करैं अतिभारी ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं घटमें होय उज्यारी ॥
राग पर्ज ॥
राम धन जो कोइ पावैहो ।
राज बड़ाई इन्द्र पदवी सुरति न लावै हो ॥
आठ सिद्धि नौनिद्धि के लालच नहिं लागै हो ।
तीनिलोक तुच्छ जानिकै तामें नहिं पागैहो ॥
अर्थ धर्म काम मोक्षकी करणी नहिं ठानै हो ।
चारि मुक्त बैकुंठ लौं कछु वस्तु न जानैहो ॥
सबसे नीचा ह्वै चलै मुख झूठ न भाखैहो ।
हिंसा अकस वासना कोइ नेक न राखैहो ॥
साधुनकी करि चाकरी जब वह धन आवैहो ।
चरणदास से रंकको शुकदेव बसावैहो ॥
जिन्हैं हरिभक्ति पियारी हो ।
मात पिता सहजै छुटैं छुटे सुत अरु नारी हो ॥
लोक भोग फीके लगैं सम अस्तुति गारीहो ।
हानि लाभ नहिं चाहिये सब आशा हारीहो ॥
जगसों मुख मोरै रहैं करैं ध्यान मुरारीहो ।
जित मनुवाँ लागोरहै भइ घट उजियारीहो ॥
४१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरु शुकदेव बताइया प्रेमी गति भारीहो ।
चरणदास चारौ वेदसों औरै कछु न्यारी हो ॥
रेखता राग भट्यार ॥
तजिकै जगतकी रीतिको करु आपनी तदबीर । इस जग
भरोसे ख्वारहो सुन यारमन ॥ यारमन गये शाह अमीर ।
एकदम करारी है नहीं क्षणक्षण में फेरैंरंग ॥ कबहूं तौ हैरां
सुखधना सुन यारमन । यारमन चल विचल बेढँग ॥ हश-
मत व शौकत थिर नहीं मत देखिहो मगरूर । ठहराव ताको
है नहीं सुन यारमन ॥ यारमन भग्गल बड़ाईधूर । जाहिं
श्वासा सबचले ज्यों आवदर गिरवाल ॥ याद साहबकी
करो सुन यारमन । यारमन सुमिर हरि हरि हाल ॥
शुकदेव सतगुरु ने मुझे कायम बतायो राम । चरणहिंदासा
चित धरो सुन यारमन ॥ यारमन जपौ आठौ याम ॥
रेखता ॥
दोदिनका जगमें जीवना करताहै क्यों गुमान ।
ऐबेशहूर गीदी टुक रामको पिछान ॥
दावा खुदीका दूरकर अपने तू दिलसेती ।
चलताहै अकड़ अकड़ जवानीका जोश आन ॥
मुरसदका ज्ञान समझिकै हुशियार हो शिताब ।
गफलतको छांड़ि सोहबत साधौंकी खूबजान ॥
दौलतकाजौम ऐसे ज्यों आब का हुबाब ।
जाता रहेगा क्षणमें पछितायगा निदान ॥
दिन रात खोवताहै दुनिया के कारबार ।
इकपलभि याद सांई कि करता नहीं अजान ॥
शब्दवर्णन । [पृष्ठ ४१५]
शुकदेव गुरू ज्ञान चरणदास को कहैं ।
भजु रामनाम सांचा पद मुक्तका निधान ॥
हेला ॥
जगको आवन जानि हेला याको शोक न कीजिये ।
यह संसार असारहैरै अरे हेला हरिसों कर पहिंचान ॥
कुटुंब संगआयो नहीं रे अरे हेला ना कोइ संग न जाय ।
ह्यांईं मिलैं ह्यांईं बीछुरैं ताको झुरै बलाय ॥
महल द्रव्य किस कामकेरे अरे हेला चलै न काहू साथ ।
राम तजे इनसों पगे हारी अपने हाथ ॥
जीवत काया धोवतेरे अरै तेल फुलेल लगाय ।
मजलिस करिकै बैठते मूये काग न खाय ॥
लाभभये हरषै नहीं रे अरे हेला हानि भये दुख नाहिं ।
ज्ञानीजन वहि जानिये सब पुरुषन के माहिं ॥
गुरु शुकदेव चितावईरे अरे हेला चरणदास हिय राखि ।
मनुष जन्म दुर्लभ मिलै वेद कहत हैं साखि ॥
झूठी जगकी प्रीति है नहीं छांडूं हरिसों मीत हेला ।
रंग कुसुम संसारकोरे अरे हेला प्रभुको रंग मजीठ ॥
धन यौवन थिर ना रहैरे अरे हेला मतकर गर्व गुमान ।
क्षण क्षण औसर जातहै हरिसों कर पहिंचान ॥
अन्तसमय पछितायगोरे हेला जब यम घेरैं आय ।
जिनके सँग तू मिल रहो कोइ न छुटावै जाय ॥
बीति गई सो जानदे रे अरे हेला अजहूं समझ गवाँर ।
शरण गहो सत्संग की गुरुके वचन सँभार ॥
श्रीशुकदेव बताइयारे अरे हेला रामनाम ततसार ।
चरणदास यों कहतहैं लैले उतरो पार ॥
४१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बोलत टेढ़ी बात हेला माया मदमातो रहै ।
सबहीसों ऐंठो फिरैरे अरे हेला क्षणमें वेग रिसात ॥
व्याज बढ़ा दुगुने करैरे अरे हेला करै चौगुने दाम ।
नानारस के स्वाद ले खाय फुलावै चाम ॥
करसों कबहुं न दानदेरे अरे हेला शीश ननावै साध ।
जिह्वासों हरि ना जपै बहुत करै बकवाद ॥
पगसों तीरथ ना रमैरे अरे हेला सुनै न श्रीभागवत ।
अकड़ अकड़ मनमाहिं यों जानि बड़ो कुलगोत ॥
परछाहीं देखे चलेरे अरे हेला बांकी बांधै पाग ।
सो देही किस कामकी खैहैं श्वान न काग ॥
पुत्र कलत्र हैं घनेरे अरे हेला सुख में करत कलोल ।
हरिभक्तन सों नेह ना कहै क्रोधके बोल ॥
धर्म कर्म कछु ना करै अरे हेला नहिं सतगुरुसों प्रीति ।
हरिचरचा सों जरिमरै यह डूबनकी रीति ॥
जगको सांचो जानिकैरै अरे हेला हरिको दियो बिसार ।
अन्तसमय यम त्रास दै डारै नरक मँझार ॥
श्रीशुकदेव ऐसे कहीरे अरे हेला छांड़ विषय जंजाल ।
चरणदास भजु रामको सोई उतारै पार ॥
हेली ॥
यह अवसर फिरि नाहिं हेली राम भजन करिलिजिये ।
यह तन क्षण क्षण जात है ज्यों तरुवर की छांह ॥
पिछले दिन सब खो दियेरी अरी हेली कियो न हरिसोंसीर ।
रहे सो ऐसो जानिले ज्यों अंजलि को नीर ॥
बचै सो लाहा लीजियेरी सतसंगति के माहिं ।
शब्दवर्णन । ४१७-
हिलमिल हरियश गाइये दृढ़ता जीकी बाहिं ॥
जन्म सफल जब होयगो कुल पारायण होय ।
एकरु सौ पीढ़ी तरैं रसना हरिगुण पोय ॥
यही स्मृति यहि वेद है यहि साधन को भेव ।
चरणदास हिय में धरौ कहिया गुरु शुकदेव ॥
और न मीता कोय हेली समुझि सँभारो रामजी ।
जीवत की रक्षा करै मुये मुक्त करें तोहिं ॥
अरु सब स्वारथके सगेरी अन्त न कोई साथ ।
सुखमें सबही रल मिलै दुखमें सुनै न बात ॥
छल करि मनकी बूझले पाछे दारै घात ।
तिनको तू अपनो कहै सो दोषी है जात ।
भेद न अपनो दीजियेरी अरी हेली कोऊ कैसो होय ।
हिरदय की हिरदय रहैं हरिही जानै सोय ॥
कै गुरु अपनो जानिये कै सतसंगत वास ।
गुरु शुकदेव बतावई देख चरणहींदास ॥
यह नहिं अपना देश हेली ह्वां नहिं मनको दीजिये ।
अपने घरको चालियेरी करि योगिनिको वेष ॥
कानन मुद्रा योगकीरी अरी हेली ज्ञान जटा शिरधारि ।
चोला भक्ति सोहावनो धीरज आसन मारि ॥
सेली¹ सतवैराग की अरी हेली शील विभूति रमाय ।
यतकी सींगी कीजिये वारंवार बजाय ॥
कर्म जलाय धूनी करो झूमौं दशवेंद्वार ।
अमल सुधारस पीजिये बाढ़ रंग अपार ॥
इसबाने पियको मिलौरी अरी हेली सदासुहागिनिहोय।
१ गुदरी ।
४१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरु शुकदेव बतावई चरणदास बन सोय ॥
अथ ज्ञान अंग ॥
राग करषा ॥
साधो गुरु दया आपको यों विचारा ।
झूठ अरु सांचको समुझिकरि मूलसों माया अरु ब्रह्मको
किया न्यारा ॥ पांच अरु तीन गुण देहको ठाटहै तासुको लगत
है सब विकारा । ब्रह्म अडोल अबोल अतोल है और निर्लिप्त
हरि निर्विकारा ॥ जाके रूप नहिं रेख अरु नाम सूरत नहीं सोई
निज तत्त्वहै निराकारा । सुरति अरु निरति दोऊ जहां थकिरहैं
तहां बिन भान अतिहै उज्यारा ॥ बिना गुरुमुखी कोउ पहुँचि
हां ना सकै कनक अरु कामिनी घेरि मारा । चलै सोइ सन्त
निर्वाण द्वै शूरमा ज्ञान अरु ध्यानको कर अहारा ॥ आवा अरु
गमनकी टूटि फांसी गई पायो गुरु भेद गयो तिमिर सारा ।
चरणदास शुकदेव मिले भर्म सब दलि मले होय रणजीत
अविगति निहारा ॥
साधो ब्रह्म दरियाव नहिं वारपारा ।
आदि अरु मध्यकहुं अन्त सूझै नहीं नेतिही नेति वेदन पुकारा ॥
मूल परकिर्त्तिसी बहुत लहरें उठैं सकै को पाय गुणहैं अपारा ।
विरंचि महादेवसे मीन बहुतै जहां होय परगट कभी गोत मारा ॥
तासुमें बुदबुदे अण्ड उपजें मिटें गुरु दई दृष्टि जासों निहारा ।
छका छवि देखिकै अतिथिका भेषकरि जगे जब भाग निरखी
बहारा ॥ मरजिया पैठिया थाह पाई नहीं थका हांईरहा फिर न
आया । गयाथा लाभको मूल खोया सबै भया आश्चर्य आपन
गवाँया ॥ पाल बिन सिन्धु अरु निरा आनन्द है आपही आप
शब्दवर्णन । ४१६
हौ निराधारा । चरणदास शुकदेव दोऊ तहां रलमिले तुरतहीं
मिटिगया खोज सारा ॥
राग धनाश्री ॥
सहजगति ज्ञान समाधि लगाई ।
रूप नाम जहाँ किरिया छूटी हू मैं रहन न पाई ॥
बिन आसन बिन संयम साधन परमातम सुधि पाई ।
शिव शक्ती मिलि एक भये हैं मन माया न हिराई ॥
मगनरहौं दुख सुख दोउ मेटै चाह अचाह मिटाई ।
जीवन मरण एक सों लागै तबते आप गवाँई ॥
मैं नाहीं नख शिख हरि राजैं आदि अन्त मध्याई ।
शङ्का कर्म कौनको लागै काकी होय मुकताई ॥
सकल आपदा व्याधि टरी सब दुई कहां मो माहीं ।
सब हमहीं रामा नहिं पइये सब रामा हम नाहीं ॥
नित आनन्द काल भय नाहीं गुरु शुकदेव समाधी ।
चरणदास निज रूप समाने यह तौ समझ अगाधी ॥
निरन्तर अटल समाधि लगाई ।
ऐसी लगी टरै नहिं कबहूं करणी आश छुटाई ॥
काको जप तप ध्यान कौन को कौन करै अब पूजा ।
कियो विचार नेक नहिं निकसै हरिबिन और न दूजा ॥
मुद्रा पांच सहजगति साधी आलस आसन सोई ।
सब रस ब्रह्म मूल जब शोधा आप विसर्जन होई ॥
भूलो बन्ध मुक्तिगति साधन ज्ञान विवेक भुलाना ।
आतम अरु परमातम भूला मन भयो तत गलताना ॥
अंचल समाधि अन्त नहिं ताको गुरु शुकदेव बताई ।
चरणदास को खोज न पइये सागर लहर समाई ॥
४२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
राग सोरठ ॥
हो अवगति जो जानै सोइ जानै ।
सब की दृष्टि परे अविनाशी कोइ कोइ जन पहिंचाने ॥
रेख जहां नहि खिंचि सकै रे ठहरै ना ह्वां राई ।
चीत चितेरा ना सकैरै पुस्तक लिखा न जाई ॥
श्वेत श्याम नहिं राता पीरा हरी भांति नहिं होई ।
अति असूंध अदृष्ट अकथ है कहि सुनि सकै न कोई ॥
सर्वस में अरु सब देशन में सर्व अंग सब माहीं ।
कटै जलै भीजै नहिं छीजै हलै चलै वह नाहीं ॥
नहिं गाढ़ा नहिं झीना कहिये नहिं सूक्ष्म नहिं भारी ।
बाला तरुणा बूढ़ा नाहीं ना वह पुरुष न नारी ॥
नहीं दूर नहिं निकट हमारे नहीं प्रकट नहिं गूझै ।
ज्ञान आँख की पलक उघारौ जब देखौरे सूझै ॥
वासों उतपति परलय होई वह दोऊते न्यारा ।
चरणदास शुकदेव दया सों
शब्दवर्णन । ४२१
भीतर बाहर पूरि रह्यो है अण्ड पिण्ड सों न्यारा ।
शुकदेवा गुरु भेद बतायो चरणहिंदासा वारा ॥
राग पर्ज ॥
गुरू हमारे अलख लखाया हो ।
देखतही ऐसे गये जल नोन घुलाया हो ॥
नखशिख ढूंढूं आपको कहिं आप न पाया हो ।
रामहिं रामा है रहा हम मूल गवाँया हो ॥
बरत करैं हम होय तौ सब नेम भुलाया हो ।
फल चाहनवारो गयो हरि हेरि हिराया हो ॥
ज्ञाता मिटिज्ञानू मिटै अरु ज्ञेय मिटाया हो ।
सोच समझ सबहीगई चरणदास नशाया हो ॥
राग धनाश्री व विलावल व सोरठ ॥
साधो भाई यह जग यों सत नाहीं ।
मीन पहार समुद विच मिरगा खेत अकाशे माहीं ॥
जलकी पोट कोट धूवांको अखल ब्रह्मको तीरं ।
बांझको पूत सींग शशशा को मृगतृष्णा को नीरं ॥
स्वप्नको भूप द्रव्य स्वप्नेको अरु जंगलको द्वारं ।
गणिका शील नाच भूतनको नारिसों ब्याहत नारं ॥
मावश को शशि रैनि को सूरज दूध नरन की छाती ।
यह सब कहनि कहावनि देखी चींटी ले भागी हाथी ॥
ऐसहि झूठ जगत सच नाहीं भेद विचारो पायो ।
चरणदास शुकदेव दया सों सांचहि सांच मिलायो ॥
४३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग रामकली ॥
सतगुरु अक्षर मोहिं पढ़ायो ।
लेखन लिखान स्याही सेती ना वह काग़ज़ मध्य चढ़ायो ॥
ना लगमात न माथे बिन्दी अरुण पीत नहिं काला ।
ऐँड़ा बेंड़ा टेढ़ा नाहीं ना वह आल जँजाला ॥
ताको देखि थकी सब करणी सबहीं साधन भागे ।
सिद्धैं भईं भोरके तारे मुक्ति न दीखै आगे ॥
जाके पढ़े पढ़न सब छूटै आशा पोथी फारी ।
मैंतो भया करम का हीना कहै सरस्वति ठाढ़ी ॥
गुरु शुकदेव पढ़ायो अक्षर अगम देश चटशाला ।
चरणदास जब पण्डित हुये धारि तिलक अरु माला ॥
वह अक्षर कोइ बिरला पावै ।
जा अक्षर के लाग न बिन्दी सतगुरु सैनहिं सैन बतावै ॥
क्षरही नाद वेद अरु पण्डित क्षरज्ञानी अज्ञानी ।
बांचन अक्षर क्षरही जानौ क्षरही चारों वानी ॥
ब्रह्मा शेष महेश्वर क्षरही क्षरही त्रैगुण माया ।
क्षरही सहित लिये अवतारा क्षर ह्यांतक जहाँ माया ॥
पांचौ मुद्रा योग युक्ति क्षर क्षरही लगै समाधा ।
आठौ सिद्धि मुक्तिफल क्षरही क्षरही तन मन साधा ॥
रवि शशि तारामण्डल क्षरही क्षरही धरणि अकासा ।
क्षरही नीर पवन अरु पावक नरक स्वर्ग क्षर वासा ॥
क्षरही उतपति परलय क्षरही क्षरही जाननहारा ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निरअक्षर है सबसों न्यारा ॥
शब्दवर्णन । ४२३
राग भैरव ॥
हरिको सकल निरन्तर पाया ।
माटी भाँड़े खाँड़ खिलौने ज्यों तरवरमें छाया ॥
ज्यों कंचन में भूषण राजै सूरत दर्पण मांहीं ।
पुतली खम्भ खम्भमें पुतली दुतिया तौ कछु नाहीं ॥
ज्यों लोहे में जौहर परगट सूतहि तानैबानै ।
ऐसे राम सकल घटमाहीं बिन सतगुरु नहिं जानै ॥
मेहँदी में रँग गन्ध फुलन में ऐसे ब्रह्मरु माया ।
जलमें पाला पाले में जल चरणदास दरशाया ॥
राग ईमन ॥
सखीरी हिलमिल रहिया पीव ।
पुष्प मध्य ज्यों गंध विराजे पिंड माहिं यों जीव ॥
जैसे अग्नि काठके अन्तर लाली है मेहँदीव ।
माटी में भाँड़े हैं तैसे दूध मध्य ज्यों घीव ॥
शुकदेवा गुरु तिमिर नशायो ज्ञान दियो कर दीव ।
चरणदास कहैं परगट दरशो अमर अखंडितसीव् ॥
राग सारंग ॥
साधो अचरज निर्गुण रामका ।
नाममर्याद ठिकाना नाहीं नाहीं द्वारा धामका ॥
मात पिता कुल गोत न वाके भेष न पुरुषा वामका ।
रूप न रेख नहीं कछु किरिया लेश नहीं ह्वां नामका ॥
सरवन लोचन रसनहिं नासा त्वचा न चोला चामका ।
आदि न अन्त न अरधै उरधै नहि ठिंगना नहिं लाँबका ॥
देखा सुना कहा नहिं जाई नहिं धौला नहिं श्यामका ।
२३
४२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव सुभावे नहिं बिनशै नहिं यामका ॥
राग सारँग ॥
घट घट में रमता रमिरह्यो ।
चेतन तजै भजै जल पाहन मूरख भ्रममें भ्रमि रह्यो ॥
एक अखण्ड रह्यो सब व्यापक लख चौरासी समरह्यो ।
प्रकट भानु ऐसे हरि दरशौं संपुट में नहिं खमरह्यो ॥
आपाजानि भूल फिर आपन नखशिखसों नहिं हमरह्यो ।
चरणदास शुकदेवहि रलगयो वचन विलासन गमरह्यो ॥
राग मालश्री ॥
तेरी गति अपरम्पार पार कैसे पइयेहो ।
योग युक्ति युगताहारे उनहूँ सुधि नहिं पाई ।
चित बुधिमनकी गमि जहाँ नाहीं सुरतिथकै थकि जाई ॥
नेति नेति कहि निगम पुकारै कहु कोउ कैसे पावै ।
ध्यान न लागै ज्ञान न सूझै अनभयहू फिरि आवै ॥
निर्गुणरूप निरालम्ब आसन केहि विधि लखिहै कोऊ ।
ब्रह्मा शेष महेश्वर थाके सकल शिरोमणि सोऊ ॥
वाणी शब्द रहित तुरियापद गुरु शुकदेव सुनायो ।
चरणहिंदास समझ सब बिसरी खोजत खोज हिरायो ॥
वा बिन और न कोय वही गुलजारी रे ।
जग फुलवारी फूलि रही है नाना रंग अनंत ।
आदि वृक्ष ताकी सब लीला नितही रहत वसंत ॥
पांच डार पाँच रंग हैं रे शाखा बहुत बिचार ।
अद्भुत गति कछु कहत न आवै फूले पुष्प अपार ॥
पात फूल फल सोहने रे ह्वै ह्वै छिपि छिपि जाहिं ।
निश्चल द्रुम इकरस रहैरे उतपति परलय नाहिं ॥
शब्दवर्णन । ४२५
बिन सींचे बिन मूल कोरे अचरज अधिक सुबास ।
जित तित खिलो शुकदेव हेरे नहीं चरणही दास ॥
राग बिहागरा ॥
तेरे बहुत रूप बहु बानी ।
तूही एक अनेक भयो है जिन जानी जिन जानी ॥
रवि शशि विष्णु महेश्वर तूही तूही चतुर बिनानी ।
ऋषिमुनि देवत सिद्ध तुही है तूही है ब्रह्मज्ञानी ॥
तुवबिन दूजो और न पइये गावत वेद पुरानी ।
कोउ कहै मायाहै दूजी तौ वह कितसों आनी ॥
तू आकाश पवन अरु पावक तू धरती तू पानी ।
तीनौगुण तोही सों निकसे तोही माहिं समानी ॥
दश ओतार तूही धर आयो तू इष्टी तू ध्यानी ।
तूही रास तुहि रास खिलइया तू ठाकुर ठकुरानी ॥
तूही गुरु शुकदेव विराजै चरणदास सिख मानी ।
गुप्त प्रकट सब तूही तूहै अद्भुत लीला ठानी ॥
यह सब एक एकही होई ।
जाके ऐसी निश्चय आव जीवन्मुक्ता सोई ॥
जैसे मनका डोर गुहे है काहू माला पोई ।
एकहि श्वास सकल घट व्यापक भूलो कहै जुदोई ॥
हमहूँ वही वही जग सारा शिव ब्रह्मादिक वोई ।
एकहि ब्रह्म अचल अविनाशी और न दुतिया कोई ॥
जिन समझा तिन आनँद पाया बिनसमझे दिया रोई ।
चरणदास नहि हरिही हरि हैं सब मैं मैं में खोई ॥
जबते एक एक करि माना ।
कौन कथै का सुननेहारा कोहै किन पहिं चाना ॥
४२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तब को ज्ञानी ज्ञान कहां है ज्ञेय कहां ठहराना ।
ध्यानी ध्येय जहां नहिं पइये तहां न पइये ध्याना ॥
जब कहां बंध मुक्त भुगतइया काको आवन जाना ।
को सेवक अरु कौन सहायक कहां लाभ कित हाना ॥
जब को उपजै कौन मरत है कौन करै पछिताना ।
को है जगत जगत को कर्त्ता त्रैगुण को अस्थाना ॥
तू तू तू अरु मैं मैं नाहीं सबही दे बिसराना ।
चरणदास शुकदेव कहां है जो है सो भगवाना ॥
राग केदार व सोरठ ॥
सो लखि हम निर्गुण झरि पाई ।
जहां न वेद कतेब पहुँचै नहीं ठकुराई ॥
चारवरण आश्रम नहीं कर्म ना काई ।
नरक अरु वैकुंठ नाहीं नहीं तन ताई ॥
प्रेम अरु जहाँ नेम नाहीं लगन ना लाई ।
आठ अँग जहँ योग नाहीं नहीं सिद्धाई ॥
आदि अरु जहाँ अंत नाहीं नहीं मध्याई ।
एक ब्रह्म अखण्ड अविचल माया नाराई ॥
ज्ञान अरु अज्ञान नाहीं नहीं मुकताई ।
चरणदास शुकदेव सम तहाँ दुई जरिजाई ॥
राग सोरठ व नट बिलावल ॥
सो नैना मोरे तुरिया ततपद अटके ।
सुरति निरतिकी गम नहिं सजनी जहां मिलनको लटके ॥
भूला जगत बकत कछु औरै वेद पुराणन ठटके ।