सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

४०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
भाईरे स्वपन यह संसार ।
देह स्वप्ना जन्म स्वप्ना स्वपन कुल ब्योहार ॥
माय स्वप्ना बाप स्वप्ना स्वपन सुत अरु नारि ।
लाज स्वप्ना जाति स्वप्ना स्वपन अस्तुति गारि ॥
योग स्वप्ना भोग स्वप्ना कियो वेद निषेद् ।
स्वप्न सो जो होय मिटि है स्वप्न सुख अरु खेद ॥
बन्ध स्वप्ना मुक्ति स्वप्ना स्वप्न ज्ञान विचार ।
स्वपन है सो बिनशि जैहै रहैगो ततसार ॥
चरणदास स्वप्ना ब्रह्म सांचो एक रस नित ज्ञान ।
सत्य स्वप्ना झूठ स्वप्ना कहाकरूं निर्बान ॥
भाई रे तजौ जग जंजाल ।
संग तेरे नाहिं चालै महल बाहन माल ॥
मात पितु सुत और नारी बोल मीठे बैन ।
डारि फांसी मोहकी तोहिं ठगत हैं दिनरैन ॥
छलधतूरो दियो सब मिलि लाज लड्डू माहिं ।
जान अपने कह भुलानो चेतता क्यों नाहि ॥
बाज जैसे चिड़ी ऊपर भँवत तोपर काल ।
मारतै गहि लै चलैंगे यम सरीखे साल ॥
सदा सँघाती हरि बिसारो जन्म दीन्हो हार ।
चरणदास शुकदेव कहिया समझ मूढ़ गंवार ॥
भाई रे समझ जग ब्योहार ।
जबताईं तेरे धन पराक्रम करै सबही प्यार ॥
अपने सुखको सबहि चाहैं मित्र सुत अरु नारि ।
इन्हौं तौ अपवश कियो है मोह बेड़ी डारि ॥