भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरु शुकदेव बतावई चरणदास बन सोय ॥
अथ ज्ञान अंग ॥
राग करषा ॥
साधो गुरु दया आपको यों विचारा ।
झूठ अरु सांचको समुझिकरि मूलसों माया अरु ब्रह्मको
किया न्यारा ॥ पांच अरु तीन गुण देहको ठाटहै तासुको लगत
है सब विकारा । ब्रह्म अडोल अबोल अतोल है और निर्लिप्त
हरि निर्विकारा ॥ जाके रूप नहिं रेख अरु नाम सूरत नहीं सोई
निज तत्त्वहै निराकारा । सुरति अरु निरति दोऊ जहां थकिरहैं
तहां बिन भान अतिहै उज्यारा ॥ बिना गुरुमुखी कोउ पहुँचि
हां ना सकै कनक अरु कामिनी घेरि मारा । चलै सोइ सन्त
निर्वाण द्वै शूरमा ज्ञान अरु ध्यानको कर अहारा ॥ आवा अरु
गमनकी टूटि फांसी गई पायो गुरु भेद गयो तिमिर सारा ।
चरणदास शुकदेव मिले भर्म सब दलि मले होय रणजीत
अविगति निहारा ॥
साधो ब्रह्म दरियाव नहिं वारपारा ।
आदि अरु मध्यकहुं अन्त सूझै नहीं नेतिही नेति वेदन पुकारा ॥
मूल परकिर्त्तिसी बहुत लहरें उठैं सकै को पाय गुणहैं अपारा ।
विरंचि महादेवसे मीन बहुतै जहां होय परगट कभी गोत मारा ॥
तासुमें बुदबुदे अण्ड उपजें मिटें गुरु दई दृष्टि जासों निहारा ।
छका छवि देखिकै अतिथिका भेषकरि जगे जब भाग निरखी
बहारा ॥ मरजिया पैठिया थाह पाई नहीं थका हांईरहा फिर न
आया । गयाथा लाभको मूल खोया सबै भया आश्चर्य आपन
गवाँया ॥ पाल बिन सिन्धु अरु निरा आनन्द है आपही आप