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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 690 में से

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पृष्ठ 464

शब्दवर्णन । ४२५
बिन सींचे बिन मूल कोरे अचरज अधिक सुबास ।
जित तित खिलो शुकदेव हेरे नहीं चरणही दास ॥
राग बिहागरा ॥
तेरे बहुत रूप बहु बानी ।
तूही एक अनेक भयो है जिन जानी जिन जानी ॥
रवि शशि विष्णु महेश्वर तूही तूही चतुर बिनानी ।
ऋषिमुनि देवत सिद्ध तुही है तूही है ब्रह्मज्ञानी ॥
तुवबिन दूजो और न पइये गावत वेद पुरानी ।
कोउ कहै मायाहै दूजी तौ वह कितसों आनी ॥
तू आकाश पवन अरु पावक तू धरती तू पानी ।
तीनौगुण तोही सों निकसे तोही माहिं समानी ॥
दश ओतार तूही धर आयो तू इष्टी तू ध्यानी ।
तूही रास तुहि रास खिलइया तू ठाकुर ठकुरानी ॥
तूही गुरु शुकदेव विराजै चरणदास सिख मानी ।
गुप्त प्रकट सब तूही तूहै अद्भुत लीला ठानी ॥
यह सब एक एकही होई ।
जाके ऐसी निश्चय आव जीवन्मुक्ता सोई ॥
जैसे मनका डोर गुहे है काहू माला पोई ।
एकहि श्वास सकल घट व्यापक भूलो कहै जुदोई ॥
हमहूँ वही वही जग सारा शिव ब्रह्मादिक वोई ।
एकहि ब्रह्म अचल अविनाशी और न दुतिया कोई ॥
जिन समझा तिन आनँद पाया बिनसमझे दिया रोई ।
चरणदास नहि हरिही हरि हैं सब मैं मैं में खोई ॥
जबते एक एक करि माना ।
कौन कथै का सुननेहारा कोहै किन पहिं चाना ॥