भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दाताको देबेका दुखहै जब मँगतों ने घेरा ॥
चारि वरण में कोउ न देखो जाको चिन्ता नाहीं ।
हरि की भक्ति बिना सब दुख है समझ देख मनमाहीं ॥
सतसंगति अरु हरि सुमरणकरि शुकदेवा गुरु कहिया ।
चरणदास बिपता सब तजिकै आनँद में नित रहिया ॥
राग सारंग ॥
नर रामभजे सुख पाय है ।
दुख भाजैं अरु पातक नाशौ जौरा निकट न आयहै ॥
चेत सबेरे कहूं पुकारे नातरु तू पछितायहै ।
जगत ठाट सब ह्यांकी शोभा संग न कोई जायहै ॥
बिन गोपाल तुम्हारो को है हमको देहु बतायहै ।
पकरि बांधि यम मारनलागैं जब को होय सहायहै ॥
देखु बिचारि समुझु मनमाहीं तो बुधि जो अधिकायहै ।
तौ तू आव उलटि हरि सौंहीं चालो जनम सिरायहै ॥
चरणदास शुकदेव कहतहैं अब यह अधिक सयानहै ।
गुरुकी शरण साधुकी संगति प्रभुको कीजै ध्यानहै ॥
राग भैरव ॥
चेतौरे नर करौ विचार । छलरूपी है यह संसार ॥
स्वभा मात पिता सुतबंधू । स्वभा है सबही सम्बन्धू ॥
देखैकहै सुनैसो स्वपना । याजगमें नाहीं कोइ अपना ॥
स्वभा धरती और अकाशा । स्वभा चन्द्रसूर्य परकाशा ॥
स्वभा जलथल पावक पौन । स्वभा योग भोग अरु मौन ॥
स्वभा मायाको व्यवहार । स्वभा कुलनाता परिवार ॥
स्वभा देश नाम अरु भेश । स्वभा उत्पति परलय शेश ॥