सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 454

शब्दवर्णन । [पृष्ठ ४१५]

शुकदेव गुरू ज्ञान चरणदास को कहैं ।
भजु रामनाम सांचा पद मुक्तका निधान ॥
हेला ॥
जगको आवन जानि हेला याको शोक न कीजिये ।
यह संसार असारहैरै अरे हेला हरिसों कर पहिंचान ॥
कुटुंब संगआयो नहीं रे अरे हेला ना कोइ संग न जाय ।
ह्यांईं मिलैं ह्यांईं बीछुरैं ताको झुरै बलाय ॥
महल द्रव्य किस कामकेरे अरे हेला चलै न काहू साथ ।
राम तजे इनसों पगे हारी अपने हाथ ॥
जीवत काया धोवतेरे अरै तेल फुलेल लगाय ।
मजलिस करिकै बैठते मूये काग न खाय ॥
लाभभये हरषै नहीं रे अरे हेला हानि भये दुख नाहिं ।
ज्ञानीजन वहि जानिये सब पुरुषन के माहिं ॥
गुरु शुकदेव चितावईरे अरे हेला चरणदास हिय राखि ।
मनुष जन्म दुर्लभ मिलै वेद कहत हैं साखि ॥
झूठी जगकी प्रीति है नहीं छांडूं हरिसों मीत हेला ।
रंग कुसुम संसारकोरे अरे हेला प्रभुको रंग मजीठ ॥
धन यौवन थिर ना रहैरे अरे हेला मतकर गर्व गुमान ।
क्षण क्षण औसर जातहै हरिसों कर पहिंचान ॥
अन्तसमय पछितायगोरे हेला जब यम घेरैं आय ।
जिनके सँग तू मिल रहो कोइ न छुटावै जाय ॥
बीति गई सो जानदे रे अरे हेला अजहूं समझ गवाँर ।
शरण गहो सत्संग की गुरुके वचन सँभार ॥
श्रीशुकदेव बताइयारे अरे हेला रामनाम ततसार ।
चरणदास यों कहतहैं लैले उतरो पार ॥