भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 451, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें४१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पाप पुण्य लेखा लिखैं यम बैठे थाना ।
कह हिसाब तुम देहुगे जब जाहि दिवाना ॥
मात पिता कोइ ह्यां नहीं सबही बेगाना ।
द्रव्य जहां पहुँवै नहीं नहिं मीत पिछाना ॥
एकसों एकहि होयगी हां सांच तुलाना ।
काहूकी चालै नहीं छनै दूधरु पाना ॥
साहिबकी करि बन्दगी दे भूखे दाना ।
समझावैं शुकदेवजी चरणदास अयाना ॥
राग काफी ॥
घरी दोमें मेला बिछुरै साधो देखि तमाशा चलना
जे ह्यां आकर हुये इकट्ठे तिनसों बहुरि न मिलना ।
जैसे नाव नदी के ऊपर बाट बटेऊ आवैं ।
मिलि मिलि जुदेहोयँ पलमाहीं आप आपको जावैं ॥
या बारी बिच फूल घनेरे रंग सुगन्ध सुहावैं ।
लागैं खिलैं फेरि कुम्हिलावैं झरैं टूटि विनशावैं ॥
दारा सुत सम्पति को सुख ज्यों मोतीओस बिलावैं ।
ह्यांईं मिलैं और ह्यां नाशें ताको क्यों पछितावैं ॥
दै कुछ लै कुछ करिले करणी रहनी गहनी भारी ।
हरिसों नेह लगाय आपनो सो तेरो हितकारी ॥
सतसंगति को लाभ बड़ो है साध भक्त समुझावैं ।
चरणदास हो राम सुमिरिले गुरु शुकदेव बतावैं ॥
वह मेला सोइ भलाहै साधो जहँ सन्तों का भेला ।
जिनके रहै सदा हरिचरचा सुमिरैं राम सुहेला ॥
कथा कहैं अरु करें कीर्त्तन ज्ञान ध्यान समुझावैं ।
सोवत जागत बैठे चलते गोविंदके गुण गावैं ॥