भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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४२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
राग सोरठ ॥
हो अवगति जो जानै सोइ जानै ।
सब की दृष्टि परे अविनाशी कोइ कोइ जन पहिंचाने ॥
रेख जहां नहि खिंचि सकै रे ठहरै ना ह्वां राई ।
चीत चितेरा ना सकैरै पुस्तक लिखा न जाई ॥
श्वेत श्याम नहिं राता पीरा हरी भांति नहिं होई ।
अति असूंध अदृष्ट अकथ है कहि सुनि सकै न कोई ॥
सर्वस में अरु सब देशन में सर्व अंग सब माहीं ।
कटै जलै भीजै नहिं छीजै हलै चलै वह नाहीं ॥
नहिं गाढ़ा नहिं झीना कहिये नहिं सूक्ष्म नहिं भारी ।
बाला तरुणा बूढ़ा नाहीं ना वह पुरुष न नारी ॥
नहीं दूर नहिं निकट हमारे नहीं प्रकट नहिं गूझै ।
ज्ञान आँख की पलक उघारौ जब देखौरे सूझै ॥
वासों उतपति परलय होई वह दोऊते न्यारा ।
चरणदास शुकदेव दया सों