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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 690 में से

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पृष्ठ 462

शब्दवर्णन । ४२३
राग भैरव ॥
हरिको सकल निरन्तर पाया ।
माटी भाँड़े खाँड़ खिलौने ज्यों तरवरमें छाया ॥
ज्यों कंचन में भूषण राजै सूरत दर्पण मांहीं ।
पुतली खम्भ खम्भमें पुतली दुतिया तौ कछु नाहीं ॥
ज्यों लोहे में जौहर परगट सूतहि तानैबानै ।
ऐसे राम सकल घटमाहीं बिन सतगुरु नहिं जानै ॥
मेहँदी में रँग गन्ध फुलन में ऐसे ब्रह्मरु माया ।
जलमें पाला पाले में जल चरणदास दरशाया ॥
राग ईमन ॥
सखीरी हिलमिल रहिया पीव ।
पुष्प मध्य ज्यों गंध विराजे पिंड माहिं यों जीव ॥
जैसे अग्नि काठके अन्तर लाली है मेहँदीव ।
माटी में भाँड़े हैं तैसे दूध मध्य ज्यों घीव ॥
शुकदेवा गुरु तिमिर नशायो ज्ञान दियो कर दीव ।
चरणदास कहैं परगट दरशो अमर अखंडितसीव् ॥
राग सारंग ॥
साधो अचरज निर्गुण रामका ।
नाममर्याद ठिकाना नाहीं नाहीं द्वारा धामका ॥
मात पिता कुल गोत न वाके भेष न पुरुषा वामका ।
रूप न रेख नहीं कछु किरिया लेश नहीं ह्वां नामका ॥
सरवन लोचन रसनहिं नासा त्वचा न चोला चामका ।
आदि न अन्त न अरधै उरधै नहि ठिंगना नहिं लाँबका ॥
देखा सुना कहा नहिं जाई नहिं धौला नहिं श्यामका ।
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