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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 690 में से

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पृष्ठ 455

४१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बोलत टेढ़ी बात हेला माया मदमातो रहै ।
सबहीसों ऐंठो फिरैरे अरे हेला क्षणमें वेग रिसात ॥
व्याज बढ़ा दुगुने करैरे अरे हेला करै चौगुने दाम ।
नानारस के स्वाद ले खाय फुलावै चाम ॥
करसों कबहुं न दानदेरे अरे हेला शीश ननावै साध ।
जिह्वासों हरि ना जपै बहुत करै बकवाद ॥
पगसों तीरथ ना रमैरे अरे हेला सुनै न श्रीभागवत ।
अकड़ अकड़ मनमाहिं यों जानि बड़ो कुलगोत ॥
परछाहीं देखे चलेरे अरे हेला बांकी बांधै पाग ।
सो देही किस कामकी खैहैं श्वान न काग ॥
पुत्र कलत्र हैं घनेरे अरे हेला सुख में करत कलोल ।
हरिभक्तन सों नेह ना कहै क्रोधके बोल ॥
धर्म कर्म कछु ना करै अरे हेला नहिं सतगुरुसों प्रीति ।
हरिचरचा सों जरिमरै यह डूबनकी रीति ॥
जगको सांचो जानिकैरै अरे हेला हरिको दियो बिसार ।
अन्तसमय यम त्रास दै डारै नरक मँझार ॥
श्रीशुकदेव ऐसे कहीरे अरे हेला छांड़ विषय जंजाल ।
चरणदास भजु रामको सोई उतारै पार ॥
हेली ॥
यह अवसर फिरि नाहिं हेली राम भजन करिलिजिये ।
यह तन क्षण क्षण जात है ज्यों तरुवर की छांह ॥
पिछले दिन सब खो दियेरी अरी हेली कियो न हरिसोंसीर ।
रहे सो ऐसो जानिले ज्यों अंजलि को नीर ॥
बचै सो लाहा लीजियेरी सतसंगति के माहिं ।