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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 690 में से

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पृष्ठ 448

शब्दवर्णन । ४०६
सबन तोकों भय दिखायो लाज लकुटीमार ।
बाजीगर के बांदरा ज्यों फिरत घर घर द्वार ॥
जबै तोको बिपति आवै जरा कोर बिकार ।
तबै तोसूं लाज मानैं करैं ना तेरि सार ॥
इनकि संगति सदा दुख है समझ मूढ़ गवाँर ।
हरि प्रियतम को सुमिरिले कहैं चरणदास पुकार ॥
राग विहाग ॥
ये सब अप स्वारथ के गरजी ।
जगमें हेत न कीजै काहूसों अपने मनको बरजी ॥
रोपें फन्द घात बहु डारें इनते तू डरयेजी ।
हृदय कपट बाहर मिठबोलैं यह छल हैगो कहजी ॥
सौगँद खाय झूठ बहु बोलैं भवसागर कैसे तरजी ।
दुख सुख दर्द दया नहिं बूझें इनसे छुटावो हरिजी ॥
वैरी मित्र सबै चुनिदेखे दिलके महरम कहजी ।
इनको दोष कहा कह दीजै यह कलियुगकी झरजी ॥
दुनियाभगल कुटिलबहु खोटी देखिछातीमेरी लरजी ।
चरणदास इनको तजि दीजै चल बस अपने घरजी ॥
राग आसावरी ॥
साधो राम भजेते सुखिया ।
राजा परजा नेमी दाता सबही देखे दुखिया ॥
जो कोई धनवंत जगतमें राखत लाख हजारा ।
उनको तौ संशयहै निशिदिन घटत बढ़त व्योहारा ॥
जिनके बहुसुत नाती कहिये और कुटुँब परिवारा ।
वें तौ जीवन मरणके काजे भरतरहैं दुखभारा ॥
नेमी नेम करत दुख पावै कर अस्नान सबेरा ।