भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव सुभावे नहिं बिनशै नहिं यामका ॥
राग सारँग ॥
घट घट में रमता रमिरह्यो ।
चेतन तजै भजै जल पाहन मूरख भ्रममें भ्रमि रह्यो ॥
एक अखण्ड रह्यो सब व्यापक लख चौरासी समरह्यो ।
प्रकट भानु ऐसे हरि दरशौं संपुट में नहिं खमरह्यो ॥
आपाजानि भूल फिर आपन नखशिखसों नहिं हमरह्यो ।
चरणदास शुकदेवहि रलगयो वचन विलासन गमरह्यो ॥
राग मालश्री ॥
तेरी गति अपरम्पार पार कैसे पइयेहो ।
योग युक्ति युगताहारे उनहूँ सुधि नहिं पाई ।
चित बुधिमनकी गमि जहाँ नाहीं सुरतिथकै थकि जाई ॥
नेति नेति कहि निगम पुकारै कहु कोउ कैसे पावै ।
ध्यान न लागै ज्ञान न सूझै अनभयहू फिरि आवै ॥
निर्गुणरूप निरालम्ब आसन केहि विधि लखिहै कोऊ ।
ब्रह्मा शेष महेश्वर थाके सकल शिरोमणि सोऊ ॥
वाणी शब्द रहित तुरियापद गुरु शुकदेव सुनायो ।
चरणहिंदास समझ सब बिसरी खोजत खोज हिरायो ॥
वा बिन और न कोय वही गुलजारी रे ।
जग फुलवारी फूलि रही है नाना रंग अनंत ।
आदि वृक्ष ताकी सब लीला नितही रहत वसंत ॥
पांच डार पाँच रंग हैं रे शाखा बहुत बिचार ।
अद्भुत गति कछु कहत न आवै फूले पुष्प अपार ॥
पात फूल फल सोहने रे ह्वै ह्वै छिपि छिपि जाहिं ।
निश्चल द्रुम इकरस रहैरे उतपति परलय नाहिं ॥