भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४११
स्वप्ना राजा रानाराव । स्वप्नै बानिक बन्यो बनाव ॥
स्वप्नै लरै मरै अरु भागै । स्वप्नै सोवै स्वप्नै जागै ॥
स्वप्नाहै यह सबही ठाट । उठी पैंठ जब मुंदिगइ हाट ॥
जो कछुहै सो सबही स्वप्ना । सांचाहरि हरि हरिहरिजपना ॥
क्यों भूला मूरख मस्तान । अजहूँ समुझि लेहिगुरुज्ञान ॥
गफलत छांड़ि भजौ हरिनाम । जो चाहै तू निश्चल धाम ॥
ज्योंसोवत स्वप्नोदरशाय । आंखिखुलै जबहीं मिटिजाय ॥
ऐसेही सब स्वपना जान । अचल अखण्ड रहै भगवान ॥
सबठाँ ब्रह्म रह्यो भरपूर । ना अति निकट नहीं बहुदूर ॥
जो कोइ खोजै सोई पावै । ततदरशी यह भेद बतावै ॥
गुरु शुकदेव पुकारि चितावै । झूठसांचको न्याव चुकावै ॥
चरणदास सब स्वपना जान । सदा एकरस ब्रह्म पिछान ॥
राग मलार ॥
सतगुरु भवसागर डरभारी ।
काम क्रोध मद लोभ भवँर जित लरजत नाव हमारी ॥
तृष्णा लहर उठत दिन राती लागत अति झकझोरा ।
ममता पवन अधिक डरपावै कांपतहै मनमोरा ॥
और महाडर नानाविधिके क्षण क्षणमें दुख पाऊं ।
अन्तरयामी बिनती सुनिये यह मैं अरज सुनाऊं ॥
गुरु शुकदेव सहाय करौ अब धीरज रहा न कोई ।
चरणदास को पार उतारो शरण तुम्हारी सोई ॥
राग बिलावल ॥
भक्ति गरीबी लीजिये तजिये अभिमाना ।
दो दिन जगमें जीवना आखीर मरजाना ॥