सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 458

शब्दवर्णन । ४१६
हौ निराधारा । चरणदास शुकदेव दोऊ तहां रलमिले तुरतहीं
मिटिगया खोज सारा ॥
राग धनाश्री ॥
सहजगति ज्ञान समाधि लगाई ।
रूप नाम जहाँ किरिया छूटी हू मैं रहन न पाई ॥
बिन आसन बिन संयम साधन परमातम सुधि पाई ।
शिव शक्ती मिलि एक भये हैं मन माया न हिराई ॥
मगनरहौं दुख सुख दोउ मेटै चाह अचाह मिटाई ।
जीवन मरण एक सों लागै तबते आप गवाँई ॥
मैं नाहीं नख शिख हरि राजैं आदि अन्त मध्याई ।
शङ्का कर्म कौनको लागै काकी होय मुकताई ॥
सकल आपदा व्याधि टरी सब दुई कहां मो माहीं ।
सब हमहीं रामा नहिं पइये सब रामा हम नाहीं ॥
नित आनन्द काल भय नाहीं गुरु शुकदेव समाधी ।
चरणदास निज रूप समाने यह तौ समझ अगाधी ॥
निरन्तर अटल समाधि लगाई ।
ऐसी लगी टरै नहिं कबहूं करणी आश छुटाई ॥
काको जप तप ध्यान कौन को कौन करै अब पूजा ।
कियो विचार नेक नहिं निकसै हरिबिन और न दूजा ॥
मुद्रा पांच सहजगति साधी आलस आसन सोई ।
सब रस ब्रह्म मूल जब शोधा आप विसर्जन होई ॥
भूलो बन्ध मुक्तिगति साधन ज्ञान विवेक भुलाना ।
आतम अरु परमातम भूला मन भयो तत गलताना ॥
अंचल समाधि अन्त नहिं ताको गुरु शुकदेव बताई ।
चरणदास को खोज न पइये सागर लहर समाई ॥