भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४२१
भीतर बाहर पूरि रह्यो है अण्ड पिण्ड सों न्यारा ।
शुकदेवा गुरु भेद बतायो चरणहिंदासा वारा ॥
राग पर्ज ॥
गुरू हमारे अलख लखाया हो ।
देखतही ऐसे गये जल नोन घुलाया हो ॥
नखशिख ढूंढूं आपको कहिं आप न पाया हो ।
रामहिं रामा है रहा हम मूल गवाँया हो ॥
बरत करैं हम होय तौ सब नेम भुलाया हो ।
फल चाहनवारो गयो हरि हेरि हिराया हो ॥
ज्ञाता मिटिज्ञानू मिटै अरु ज्ञेय मिटाया हो ।
सोच समझ सबहीगई चरणदास नशाया हो ॥
राग धनाश्री व विलावल व सोरठ ॥
साधो भाई यह जग यों सत नाहीं ।
मीन पहार समुद विच मिरगा खेत अकाशे माहीं ॥
जलकी पोट कोट धूवांको अखल ब्रह्मको तीरं ।
बांझको पूत सींग शशशा को मृगतृष्णा को नीरं ॥
स्वप्नको भूप द्रव्य स्वप्नेको अरु जंगलको द्वारं ।
गणिका शील नाच भूतनको नारिसों ब्याहत नारं ॥
मावश को शशि रैनि को सूरज दूध नरन की छाती ।
यह सब कहनि कहावनि देखी चींटी ले भागी हाथी ॥
ऐसहि झूठ जगत सच नाहीं भेद विचारो पायो ।
चरणदास शुकदेव दया सों सांचहि सांच मिलायो ॥