भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४१७-
हिलमिल हरियश गाइये दृढ़ता जीकी बाहिं ॥
जन्म सफल जब होयगो कुल पारायण होय ।
एकरु सौ पीढ़ी तरैं रसना हरिगुण पोय ॥
यही स्मृति यहि वेद है यहि साधन को भेव ।
चरणदास हिय में धरौ कहिया गुरु शुकदेव ॥
और न मीता कोय हेली समुझि सँभारो रामजी ।
जीवत की रक्षा करै मुये मुक्त करें तोहिं ॥
अरु सब स्वारथके सगेरी अन्त न कोई साथ ।
सुखमें सबही रल मिलै दुखमें सुनै न बात ॥
छल करि मनकी बूझले पाछे दारै घात ।
तिनको तू अपनो कहै सो दोषी है जात ।
भेद न अपनो दीजियेरी अरी हेली कोऊ कैसो होय ।
हिरदय की हिरदय रहैं हरिही जानै सोय ॥
कै गुरु अपनो जानिये कै सतसंगत वास ।
गुरु शुकदेव बतावई देख चरणहींदास ॥
यह नहिं अपना देश हेली ह्वां नहिं मनको दीजिये ।
अपने घरको चालियेरी करि योगिनिको वेष ॥
कानन मुद्रा योगकीरी अरी हेली ज्ञान जटा शिरधारि ।
चोला भक्ति सोहावनो धीरज आसन मारि ॥
सेली¹ सतवैराग की अरी हेली शील विभूति रमाय ।
यतकी सींगी कीजिये वारंवार बजाय ॥
कर्म जलाय धूनी करो झूमौं दशवेंद्वार ।
अमल सुधारस पीजिये बाढ़ रंग अपार ॥
इसबाने पियको मिलौरी अरी हेली सदासुहागिनिहोय।
१ गुदरी ।