भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४०७
सतसंगतिके निकट न आवै जोहै ठाट तरनको ॥
यमकिंकर जब आनि गहैंगे तब ना धीर धरनको ।
गुरु शुकदेव सहाय करेंगे आसरो दास चरनको ॥
राग केदारा ॥
सो मेरो कहो मानरे भाई ।
ज्ञान गुरूको राख हिये में बंध कटि जाई ॥
बालपनते खेलि खोयो गई तरुणाई ।
चेत अजहूँ भली बरहै जराहूं आई ॥
जिनके कारण बिमुख हरिते फिरत भटकाई ।
कुटुम्ब सबही सुख के लोभी तेरे दुखदाई ॥
साधु पदवी धारणाधर छांड़ कुटिलाई ।
वासना तजि भोग जगके होय मुकताई ॥
बहुरि योनी नाहिं आवै परमपद पाई ।
चरणदास शुकदेवके घर आनँद अधिकाई ॥
भाईरे अवधि बीतीजात ।
अंजली जल घटत जैसे तारे ज्यों परभात ॥
श्वास पूंजी गांठि तेरे सो घटत दिन रात ।
साधु संगत पैंठ लागी ले लगै सोइ हाथ ॥
बड़ो सौदा हरि सँभारो सुमिरिलीजै प्रात ।
काम क्रोध दलाल ठगिया बणिजमत इनसाथ ॥
लोभ मोह बजाज छलिया लगैंहैं तेरि घात ।
शब्द गुरुको राखि हिरदय तौ दगा नहिं खात ॥
अपनी चतुराई बुधि पर मति फिरै इतरात ।
चरणदास शुकदेव चरण परश तजि कुलजात ॥