भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ४१३
बोलैं अमृतवाणी सबसों कुमति कुबुद्धि छुटावैं ।
हरिकी भक्ति साधुकी संगति यह उपदेश बतावैं ॥
माला तिलक रामको बाना सुन्दर वेष बनावैं ।
घरघर होय आरती मंगल नवधासों चितलावै ॥
निशिदिन आनँदरूप दिवाली सदा वसन्त सोहायो ।
प्रेम महोत्सव नितही उत्सव सबै ठाट मनभायो ॥
या बिधि सों मन मगनहोय करि भजन करैं अतिभारी ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं घटमें होय उज्यारी ॥
राग पर्ज ॥
राम धन जो कोइ पावैहो ।
राज बड़ाई इन्द्र पदवी सुरति न लावै हो ॥
आठ सिद्धि नौनिद्धि के लालच नहिं लागै हो ।
तीनिलोक तुच्छ जानिकै तामें नहिं पागैहो ॥
अर्थ धर्म काम मोक्षकी करणी नहिं ठानै हो ।
चारि मुक्त बैकुंठ लौं कछु वस्तु न जानैहो ॥
सबसे नीचा ह्वै चलै मुख झूठ न भाखैहो ।
हिंसा अकस वासना कोइ नेक न राखैहो ॥
साधुनकी करि चाकरी जब वह धन आवैहो ।
चरणदास से रंकको शुकदेव बसावैहो ॥
जिन्हैं हरिभक्ति पियारी हो ।
मात पिता सहजै छुटैं छुटे सुत अरु नारी हो ॥
लोक भोग फीके लगैं सम अस्तुति गारीहो ।
हानि लाभ नहिं चाहिये सब आशा हारीहो ॥
जगसों मुख मोरै रहैं करैं ध्यान मुरारीहो ।
जित मनुवाँ लागोरहै भइ घट उजियारीहो ॥