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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 690 में से

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पृष्ठ 461

४३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग रामकली ॥
सतगुरु अक्षर मोहिं पढ़ायो ।
लेखन लिखान स्याही सेती ना वह काग़ज़ मध्य चढ़ायो ॥
ना लगमात न माथे बिन्दी अरुण पीत नहिं काला ।
ऐँड़ा बेंड़ा टेढ़ा नाहीं ना वह आल जँजाला ॥
ताको देखि थकी सब करणी सबहीं साधन भागे ।
सिद्धैं भईं भोरके तारे मुक्ति न दीखै आगे ॥
जाके पढ़े पढ़न सब छूटै आशा पोथी फारी ।
मैंतो भया करम का हीना कहै सरस्वति ठाढ़ी ॥
गुरु शुकदेव पढ़ायो अक्षर अगम देश चटशाला ।
चरणदास जब पण्डित हुये धारि तिलक अरु माला ॥
वह अक्षर कोइ बिरला पावै ।
जा अक्षर के लाग न बिन्दी सतगुरु सैनहिं सैन बतावै ॥
क्षरही नाद वेद अरु पण्डित क्षरज्ञानी अज्ञानी ।
बांचन अक्षर क्षरही जानौ क्षरही चारों वानी ॥
ब्रह्मा शेष महेश्वर क्षरही क्षरही त्रैगुण माया ।
क्षरही सहित लिये अवतारा क्षर ह्यांतक जहाँ माया ॥
पांचौ मुद्रा योग युक्ति क्षर क्षरही लगै समाधा ।
आठौ सिद्धि मुक्तिफल क्षरही क्षरही तन मन साधा ॥
रवि शशि तारामण्डल क्षरही क्षरही धरणि अकासा ।
क्षरही नीर पवन अरु पावक नरक स्वर्ग क्षर वासा ॥
क्षरही उतपति परलय क्षरही क्षरही जाननहारा ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निरअक्षर है सबसों न्यारा ॥