भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
शब्दवर्णन । ४२७
प्रीति रीतकी सार न जानैं डोलत भटके भटके ॥
किरिया कर्म भर्म उरझेरे ये माया के झटके ।
ज्ञान ध्यान दोउ पहुँचत नाहीं राम रहीमा फटके ॥
जग कुल रीति लोक मर्यादा मानत नाहीं हटके ।
चरणदास शुकदेव दयासों त्रैगुण तजिकै सटके ॥
राग सोरठ ॥
है कोइ जानै भेद हमार ।
सब सबमें हम सबके माहीं में मैं व्यापक मैं न्यारा ॥
हम अडोल हम डोलत निशिदिन हम सूक्ष्म हम भारा ।
हमहीं निर्गुण हमहीं सगुंण हमहीं दश अवतारा ॥
हमहा एक बहुतहो खेले हमहीं सकल पसारा ।
हमहीं ज्ञान ध्यान पुनि हमहीं हमहीं धारणहारा ॥
हमहीं आदि अन्त पुनि हमहीं हमहीं रूप अपारा ।
महाराज हम वार पार हैं हमहीं जग उजियारा ॥
हमहीं गुरु शुकदेव विराजैं हमहिं तरैं हम तारा ।
चरणदास घट हमहीं बोलैं समझै समझनहारा ॥
राग काफी ॥
मैं कोइ अजबहूँ मेरा अजब तमाशा जोर ।
मेरेहि पिण्ड खण्ड ब्रह्मण्डा मैं पूरण सब ठौर ॥
मैं ब्रह्मा मैं विष्णु महादेव मैं कमला मैं गौर ।
मैं रवि चन्द्र इन्द्र इन्द्राणी मैं गरजत घनघोर ॥
मैं गुण तीनि पांच तत्त्व मैं हीं मैं दश दिशि चहुँओर ।
मैं निहरूप रूपधरि नाना निशिदिन करत कलोर ॥
४२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मैं गुप्त मैं मुक्ता परगट मैंहीं भर्म झकोर ।
चरणदास मोबिन नहिं रंचक दूजा कोई और ॥
राग विहागरा ॥
गुप्तमतेकी बातरी जानै सोइ जानै ।
पशू ज्ञान अजमत को देखो अनभुस एकै सानै ॥
चलनीकी गति सबकी मति है मनमें अधिक सयानै ।
गहि असार सारको डारै निश्चल बुधि नहिं आनै ॥
हूँ गूंगो जगको नहीं सूझै सैन नहीं कोइ मानै ।
कासों कहौं अरु को सुनै सजनी कहूँ तौ को पहिंचानै ॥
सत्य ब्रह्मको जानत नाहीं मुरुख मुग्ध अयानै ।
चरणदासकह समुझतनहिंभोंदू फिरिफिरि झगरोठानै ॥
सुनिहो मुक्त मुक्त करूं तेरी ।
वेद पुराण जँजीर जरी है सबहीगत मारग मिलि घेरी ॥
तैं तौ मुक्ति बहुतकी कीन्ही जिन पापन उरझेरी ।
बन्धन सकल छुटाय काटूं जो आधीन होय तू मेरी ॥
स्वर्ग पताल ठौर नहिं तोको डोलत पेरी पेरी ।
अचल पुरुषसों जाय मिलाऊं तोहिं जानि साधनकी चेरी ॥
शुकदेव गुरु जब किरपा कीन्ही तू नाहीं कहुँ हेरी ।
चरणहिंदास वासना तजिकै आपहि आप करिहै निवेरी ॥
राग विहागरा व बिलावल ॥
अब हम ज्ञान गुरू से पाया ।
दुबिधा खोय एकता दरशी निश्चल ह्वै घर आया ॥
हिरदा शुद्ध हुआ बुधि निर्मल चाह रही नहिं कोई ।
ना कछु सुनौं न परसूं बूझं उलटि पलटि सब खोई ॥
समझभई जब आनंद पाये आतम आतम सूझा ।
सूधा भया सकल मन मेरो नेक न कहूं अरूझा ॥
मैं सबहुन में सब मोहूं में सांच यही करि जाना ।
यही वही है वही यही है दूजा भाव मिटाना ॥
शुकदेवा ने सब सुख दीन्हे तिरपत होय अधायो ।
चरणदास निकसा नहिं रंचक परमातम दरशायो ॥
राग विलाव विहागरा ॥
गुरु विन कौन डुबोवनहारा ।
ब्रह्म समुद्रमें जो कोइ बूड़ो छुटिगये सकल विकारा ॥
सिंधु अथाह अगाध अचल है जाको वार न पारा ।
वाकी लहरि मिटत वाही में कौन तरैको तारा ॥
त्रैगुणरहत सदाही चेतन ना काहू उनहारा ।
निराकार आकार न कोई निर्मल अति निर्धारा ॥
अकरी अलख अरूप अनादी तिमिर नहीं उजियारा ।
तामें अण्ड दिपत ऐसे करि ज्यों जल मध्ये तारा ॥
काल ज्वाल भै भूती नाहीं तहां नहीं भ्रमभारा ।
चरणदास शुकदेव दयासों बूड़िगयेही पारा ॥
राग सोरठ व आसावरी ॥
सतगुरु निजपुर धाम बसाये ।
जितकेगये अमर हैं बैठे भवजल बहुरि न आये ॥
योगी योग युक्ति करिहारे ध्यानी ध्यान लगावैं ।
हरिजन गुरुकी दया बिना यों दृष्टि नहीं दरशावैं ॥
पंडित मुंडित चुंडित ढूंढें पढ़ि सुनि वेद पुरानैं ।
जासों वै सब पायो चाहें सो वै नेति बखानैं ॥
जंगम यती तपी संन्यासी सबही बहदिशि धावैं ।
४३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सुरति निरतिकी गम जहाँ नाहीं वे कहौ कैसे पावैं ॥
देश अटपटा वेगम नगरी निगुरे राह न पाया ।
चरणदास शुकदेव गुरूने किरपा करि पहुँचाया ॥
राग सोरठ ॥
हमारे गुरु हरि नगर दिखायाहो ।
उलटी वाट घाट जहाँ नाहीं निजपुर वास बसायाहो ॥
चन्द न सूर गगन नहिं तारे राति दिवस नहिं पायाहो ।
नहीं तिमिर जहाँ चांदनि नाहीं नहीं धूप नहिं छायाहो ॥
मनसों अगम सुगम नहिं बुधिसों अनभय अन्त न लायाहो ।
और कहौ कैसे करि पावै निगम नेति जेहि गायाहो ॥
है प्रत्यक्ष उदय सूरज ज्यों संपुट नाहिं छिपायाहो ।
बिन गुरु गमके अंजन आंजे दृष्टि नहीं दरशाया हो ॥
जनक जहाँ शुकदेव विराजैं चरणदास मिलि धाया हो ।
जगकी व्याधि लगन नहिं पाई किरपा करि पहुंचाया हो ॥
हमारे गुरु मारग बतलाया हो ।
आन देवकी सेवा त्यागी अज अविनाशी ध्याया हो ॥
हरि पूरण परसो निश्चयसों छांड़ौ झूठी माया हो ।
इकरस आतम नितही जानौ क्षणभंगी है काया हो ॥
चाहे मुक्तकरै तन किरिया भर्म अधिक भर्माया हो ।
वो करि पेड़ बबूल शूलके आँब कहो किन पाया हो ॥
अपना खोज किया नहिं कवहूं जल पाहन भटकाया हो ।
जैसे फल सेवत सेमर को कीर अधिक पछिताया हो ॥
ज्ञानपदारथ कठिन महानिधि बिन भेदी किन पाया हो ।
चरणदास घट सोहं सोहं तामें उलटि समाया हो ॥
शब्दवाण । ४३१
राग काफी ॥
इन नैनन निराकार लहा ।
कहन सुननकी कौन पतीजै जान अजान है सहज रहा ॥
जित देखो तित अलख निरंजन अमर अडोल अबोलमहा ।
ज्योति जगत बिच मिलमिल झलकै अगम अगोचर पूरि रहा ॥
अलख लखा जब बेगमहूवा भर्मकोट जब तुरत दहा ।
सर्वमयी सब ऊपर राजै शून्य स्वरूपी ठोसठहा ॥
जीवन्मुक्त भया मन मेरा निर्भय निर्गुण ज्ञान महा ।
गुरु शुकदेव करी जब किरपा चरणदास सुख सिन्धु बहा ॥
राग आसावरी ॥
जबसों मन चंचल घर आया ।
निर्मल भया मैलगये सगरे तीरथ ध्यान जु न्हाया ॥
निर्वासी ह्वै आनँद पाये या जगसों मुख मोड़ा ।
पांचो भई सहज वशमेरे जब इनका रस छोड़ा ॥
भय सब छूटे अब को लूटे दूजी आश न कोई ।
सिमिटिसिमिटिरहा अपनेमाहीं सकल विकलनहिं होई ॥
निजमन हूवा मिटिगा दूवा को वैरी को मीता ।
बन्धमुक्तका संशय नाहीं जन्म मरणकी चीता ॥
गुरु शुकदेव भेव मोहिं दीयो जबसों यह गति साधी ।
चरणदाससों ठाकुरहूये छुटिगये वाद विवादी ॥
हम तौ आतम पूजाधारी ।
समझिसमझिकरिनिश्चय कीन्ही और सबनपर भारी ॥
और देवल जहाँ धुँधली पूजा देवत दृष्टि न आवै ।
हमरा देवत परगट दीखै बोलै चालै खावै ॥
जित देखौं तित ठाकुरद्वारे करौं जहां नित सेवा ।
४३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पूजा की विधि नीके जानौं जासों परसन देवा ॥
करि सनमान स्नान कराऊं चन्दन नेह लगाऊं ।
मीठे वचन पुष्प सोइ जानौं द्वै करि दीन चढ़ाऊं ॥
परसन करि करि दरसन पाऊं बार बार बलिजाऊं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं आठपहर सुख पाऊं ॥
ये मन आतम पूजा कीजै ।
जितनी पूजा जगके माहीं सबहुन को फल लीजै ॥
जो जो देही ठाकुरद्वारे तिनमें आप विराजैं ।
देवल में देवत हैं परगट आछी विधिसों राजैं ॥
त्रैगुण भवन सँभारि पूजिये अनरस होन न पावै ।
जैसेको तैसाही परसौ प्रेम अधिक उपजावै ॥
और देवता दृष्टि न आवै धोखे को शिर नावै ।
आदि सनातनरूप सदाही मूरख ताहि न ध्यावै ॥
घटघट सूझै कोइ यक बूझै गुरु शुकदेव बतावैं ।
चरणदास यह सेवन कीन्हे जिवन्मुक्त फल पावैं ॥
राग विहागरा
सब जग पांचतत्त्वका उपासी ।
तुरियातीत सबन सों न्यारा अविनाशी निर्वासी ॥
कोई पूजै देवल मूरति सो पृथ्वी तत्त्व जानौं ।
कोई न्हावै पूजै तीरथ सो जलको तत्त्व मानौं ॥
अग्निहोत्र अरु सूरज पूजा सो पावक तत्त्व देखा ।
पवन खैंचि कुंभक को राखै वायुतत्त्व को लेखा ॥
कोई तत्त्वाकाश को पूजै ताको ब्रह्म बतावै ।
जो सबके देखन में आवै सो क्यों अलख कहावै ॥
परमतत्त्व पांचौ से आगे गुरु शुकदेव बखानै ।
शब्दवर्णन । ४३३
चरणदास निश्चय मन आनौ बिरला जन कोइ जान ॥
राग जयकरी ॥
ब्रह्म अरूप धरे बहुरूप कहौ कोउ कैसो स्वरूप कहै ।
सबमें है सबसे है न्यारा कोई भेद अनूपलहै ॥
कहुं कहुं मूरख गुंगभयो है कहुं कहुं वक्ता वेदपढ़ै ।
कहुं कहुं राव रंक दुख सुख है कहुं कहुं भोगी भोगकरै ॥
कहुं कहुं राधे रूप बनावै कहुं कहुं मोहन रास रचै ।
मुड़ि मुड़ि जावै फेरि मनावै प्यार प्रीतिके चावचहै ॥
कहुंकहुं सूरति मोहनि मूरति कहुं कहुंलालन फंदपरे ।
कहुं कहुं मधुवा कहुं कहुं प्याला कहुंकहुं पीवत प्रेमभरे ॥
कहुं कहुं ज्ञानी नाना वानी कहुं भरम में भूलिरहे ।
शुकदेवा गुरु हो समझावैं चरणहिंदासा चरणगहे ॥
राग मंगलचांदूवा बिलावल ॥
कर्मकरि निष्कर्म होवै फेरि कर्म न कीजिये ।
भूलि कै कोइ कर्म साधै उलटि कर्म न दीजिये ॥
कर्म त्यागै जगै आतम यह निश्चयकरि जानिये ।
जब निर्भय पद सुलभपावै सांच हियमें आनिये ॥
सांच हियमें राखि अवधू नाम निर्गुण नितजपौ ।
अग्नि इन्द्री कर्म लकड़ी पंच अग्नी अस तपौ ॥
जैसे टूट गहनो खोज मेटै होय सोना अतिसुखी ।
ऐसे योग भक्ति वैरागसेती कर्म काटै गुरुमुखी ॥
जासों मिटै आपा आप सहजै ब्रह्मविद्या ठानिये ।
गुरू शुकदेव युक्ति भाषै चरणदास पिछानिये ॥
३३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ ॥
साधो भर्मा यह संसारा ।
गतमति लोक बड़ाई उरझे कैसे हो छुटकारा ॥
भर्म पड़े नानाविधि सेती तीरथ वर्त्त अचारा ।
देह कर्म अभिमानी भूले छूछपकरि ततडारा ॥
योगी योगयुक्त करि हारे पण्डित वेदपुराना ।
षट दर्शन पग आप पुजावैं पहिरि पहिरि रँगबाना ॥
जानत नाहिं आप हम को हैं को है वह भगवाना ।
को यह जगत कौनगति लागै समझै ना अज्ञाना ॥
जाकारण तुम इत उत डोलो ताको पावत नाहीं ।
चरणदास शुकदेव बतायो हरि नारायण माहीं ॥
हेली ॥
यह अचरजकी बात हेली कौन सुनै कासों कहूं ।
दूर हुतो जब चाव थोरी अरी हेली अब नहिं छोड़ै साथ ॥
जहँ देखौं तहाँ साँवरोरी अरी हेली तनमन रहो समाय ।
अंतर्यामी एक है द्वितीया ना ठहराय ॥
मत भटकै भय भर्म में री उलटि आपको देख ।
तोही में हरि बसत हैं गावत वेद विशेख ॥
जब तू मोसी होयगी री अरी हेली तब समझैगी बात ।
गूंगे को स्वप्नो भयो यह सुख कहो न जात ॥
जो चाहै हरिसों मिलोरी अरी गुरु शुकदेव मनाव ।
चरणदास सखी ने कह्यो आप आप में पाव ॥
हरि पाये फल देख हेली पावत ही खोई गई ।
जात अटक कुल खोय गयेरी अरी हेली खोये वरण अरुभेष ॥
जन्म मरण सब खोगयेरी अरी हेली बंधमुक्त गये खोय ।
शब्दवर्णन । ४३५
ज्ञान अज्ञान न पाइये नेम धर्म नहिं होय ॥
लाज गई अरु भय गयेरी अरी हेली अरु साथहि गई उपाधि ।
आशा अरु करणी गई खोये वाद विवाद ॥
मैं नाहीं हरिही रहेरी तू दौरत हरि ओट ।
पावैगी जब जानिहै हरि पावनके खोट ॥
गुरु शुकदेव सुनाइयारी अरी हेली चरणदास मन शोच ।
सब बातनसों जायगी रहै न तेरा खोज ॥
वह घर कैसा होय हेली जितके गये न बाहुरे ।
अमरपुरी जासों कहैरी अरी हेली मुक्तधाम है सोय ॥
विकट घाट वा ठौरकोरी शठ नहिं पावै पंथ ।
गुरुमुख ज्ञानी जाहिंहैं हरिसों सन्मुख संत ॥
त्रैगुण मत पहुँचे नहींरी अरी हेली छहौऋतुहाँ नाहिं ।
रवि शशि दोऊ हाँ नहीं नहीं धूप नहिं छाहिं ॥
अवधिनहीं कायानहींरी अरी हेली कलह कलेश न काल।
संशय शोक न पाइये नहिं माया को जाल ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरी हेली चरणदास लहै देश ।
बिन सतगुरु नहिं पावई जो नानाकर भेश ॥
हेला ॥
दृष्टि उठाकर देख हेला ब्रह्म अनादि अरूप है।
आदि नहीं अन्तौ नहींरे हेला आप सनातन एक॥
नहिंधौला काला नहीं रे हेला हरा पीत नहिं लाल ।
तीनों गुणसे है परे नहीं पुरुष नहिं बाल ॥
शस्तर छेदि सकैन रे अरे हेला पावक सकै न जारि।
नीर भिजोय सकै नहीं ताहि न ब्यापै बयारि ॥
४३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रेख जहाँ नहिं खिंचि सकैरे अरे हेला राई ना ठहराय ।
लेप जहाँ नहिं चढ़िसकै सकै नहिं कोइ पाय ॥
नहीं दूर निकटौ नहींरे अरे हेला नहीं प्रगट नहिं गूप ।
गुरु कृपा सो पाइये सुन्दर बहुत अनूप ॥
है अडोल डोलै नहीं रे अरे हेला है अबोल नहि बोल ।
देशकाल सों रहित है और कहा कहुँ खोल ॥
जैसा था सोइ आज है रे अरे हेला नया पुराना नाहिं ।
जासों यह जग है भरो जग वाही के माहिं ॥
शक्ति घनी लीला घनी रे अरे हेला घने नाम बहुरूप ।
त्रै देवा से बहुत हैं इन्दर से बहु भूप ॥
चन्द्र घने सूरज घनेरे अरे हेला घने पिण्ड ब्रह्माण्ड ।
सब कुछ आपहि है रह्यो निर्मल अचल अखण्ड ॥
जनकदियो शुकदेवकोरे अरे हेला उनमोंको कहिदीन ।
दरश भयो चरणदास को सदा रहौं लवलीन ॥
अचरज अलख अपार हेला वाकी गति नहिं पाइये ।
बहु निषेध जोपै करे रे अरे हेला तौ जावैगा हार ॥
बानीथकि बुधिहूयथकैरे अरे हेला अनभय थकि थकि जाय ।
ब्रह्मादिक सनकादिकहू नारद थकि गुण गाय ॥
वेद थके अरु व्यासहूरे अरे हेला ज्ञानी थके अरु ज्ञान ।
शंकर से योगी थके करि करि निर्मल ध्यान ॥
बहुतक कथि कथिही गयेरे अरेहेला नेक न निबटी बूझ ।
वाचक ज्ञानी कहत हैं हमने पायो सूझ ॥
पांचौ इन्द्रियनसों लखैरे अरे हेला ताको सांच न मानि ।
जो जो इन सों देखिये तिनकी निश्चय हानि ॥
गुरु शुकदेव सुनावई रे अरे हेला समझ चरणहीं दास ।
शब्दवर्णन । ४३७
अपने ही परकाश में आप रहा परकास ॥
राग हिंडोलना ॥
झूलत गुरुमुख सन्त अलख हिंडोलने ।
नाभि भृकुटी खंभ रोपे सोहं डोरी लाय ।
सुरति पटरी बैठि सजनी क्षण आवै क्षण जाय ॥
मन मनसा दोउ लगे झूलन धारणा लै संग ।
ध्यान झोटे देत सजनी भलो लागो रंग ॥
सखिसहेली सिमिटि आई पींग पींगन नेह ।
बूंद आनँद सब भिगोई सघन बरसै मेघ ॥
चार वाणी खड़ी गावैं महारँगीली नार ।
मुक्तिचारौ मालिनी जहाँ गुहि गुहि लावैं हार ॥
त्रिगुण बकुला उड़न लागे देखि बादल लै ।
संग पियके सदा झूलैं ताते लागै न भै ॥
चरणदास को नित झुलावैं ईश झूलैं शुकदेव ।
शिवसनकादिक नारद झूलैं करि करि गुरुकीसेव ॥
अथ सर्वअंग ॥
राग मंगल ॥
मन रोगी भयो पिंग कि कुबुधि विकार सों ।
बाढ़ी व्यथा अपार लोभ के भारसों ॥
कर्म्म भरो मतिहीन छील छलसों छयो ।
पांच पचीसौ घेरि मोह मदने दह्यो ॥
कैसे यह दुखजाय कि पूँछन को चल्यो ।
तब पूरण गुणवन्त वेद सतगुरु मिल्यो ॥
करगहि कियो विचार कह्यो समझायकै ।
४३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रेख जहाँ नहिं खिंचि सकैरे अरे हेला राई ना ठहराय ।
लेप जहाँ नहिं चढ़िसकै सकै नहिं कोइ पाय ॥
नहीं दूर निकटौ नहींरे अरे हेला नहीं प्रगट नहिं गूप ।
गुरु कृपा सो पाइये सुन्दर बहुत अनूप ॥
है अडोल डोलै नहीं रे अरे हेला है अबोल नहिं वोल ।
देशकाल सों रहित है और कहा कहूँ खोल ॥
जैसा था सोइ आज है रे अरे हेला नया पुराना नाहिं ।
जासों यह जग है भरो जग वाही के माहिं ॥
शक्ति घनी लीला घनी रे अरे हेला घने नाम बहुरूप ।
त्रै देवा से बहुत हैं इन्दर से बहु भूप ॥
चन्द्र घने सूरज घनेरे अरे हेला घने पिण्ड ब्रह्माण्ड ।
सब कुछ आपहि है रह्यो निर्मल अचल अखण्ड ॥
जनक दियो शुकदेवकोरे अरे हेला उनमोको कहिदीन ।
दरश भयो चरणदास को सदा रहौं लवलीन ॥
अचरज अलख अपार हेला वाकी गति नहिं पाइये ।
बहु निषेध जोपै करे रे अरे हेला तौ जावैगा हार ॥
बानीथकि बुधिहू थकैरे अरे हेला अनभय थकि थकि जाय ।
ब्रह्मादिक सनकादिकहू नारद थकि गुण गाय ॥
वेद थके अरु व्यासहुरे अरे हेला ज्ञानी थके अरु ज्ञान ।
शंकर से योगी थके करि करि निर्मल ध्यान ॥
बहुतक कथि कथिही गयेरे अरेहेला नेक न निबटी बूझ ।
वाचक ज्ञानी कहत हैं हमने पायो सूझ ॥
पांचौ इन्द्रियनसों लखैरे अरे हेला ताको सांच न मानि ।
जो जो इन सों देखिये तिनकी निश्चय हानि ॥
गुरु शुकदेव सुनावई रे अरे हेला समझ चरणहीं दास ।
शब्दवर्णन । ४३७
अपने ही परकाश में आप रहा परकास ॥
राग हिंडोलना ॥
झूलत गुरुमुख सन्त अलख हिंडोलने ।
नाभि भृकुटी खंभ रोपे सोहं डोरी लाय ।
सुरति पटरी बैठि सजनी क्षण आवै क्षण जाय ॥
मन मनसा दोउ लगे झूलन धारणालै संग ।
ध्यान झोटे देत सजनी भलो लागो रंग ॥
सखिसहेलीं सिमिटि आईं पींग पींगन नेह ।
बूंद आनंद सब भिगोई सघन बरसै मेह ॥
चार वाणी खड़ी गावें महारँगीली नार ।
मुक्तिचारौ मालिनी जहाँ गुहि गुहि लावैं हार ॥
त्रिगुण बकुला उड़न लागे देखि बादल लै ।
संग पियके सदा झूलैं ताते लागै न भै ॥
चरणदास को नित झुलावैं ईश झुलैं शुकदेव ।
शिवसनकादिक नारद झूलैं करि करि गुरुकीसेव ॥
अथ सर्वअंग ॥
राग मंगल ॥
मन रोगी भयो पिंग कि कुबुधि विकार सों ।
बढ़ी व्यथा अपार लोभ के भारसों ॥
कर्म्म भरो मतिहीन छील छलसों छयो ।
पांच पचीसौ घेरि मोह मदने दह्यो ॥
कैसे यह दुखजाय कि पूँछन को चल्यो ।
तब पूरण गुणवन्त वेद सतगुरु मिल्यो ॥
करगहि कियो विचार कह्यो समझायकै ।
४३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो कछु तेरे रोग सो देहुं बतायकै ॥
महापाप की ताप चढ़ी तोहिं धायकै ।
संशयको सनिपात मिल्यो है जायकै ॥
विषय विषय ज्वर रह्यो जु हिये समायकै ।
तृष्णाकी बहु प्यास रही मन भायकै ॥
सतसंगति को पक्ष कबौं नाहीं कियो ।
इन्द्रिन के रस रोग बिगरि सबही गयो ॥
कुसतसंग संग्रहणी जियमाहीं भई ।
ममताको मल बढ़ो भूख ताते गई ॥
काम क्रोधकौं कुष्ठ सकल तन छायकै ।
शोक शूलको मूल करेजे आयकै ॥
माया पवन झकोरसों सूजन बहुत है ।
त्रैगुणके त्रयदोष बात बहकी कहै ॥
चिन्ताही की चीस उठै दिन रातही ।
अतिनिन्दा से नींद गई ता साथही ॥
शीश गुमान पिराय दरद हिंसा घनो ।
कलह कल्पना भर्मसों रहतो उनमनो ॥
औरौ बड़ी उपाधि बढ़ै तेरी देहमें ।
भीजि रह्यो है शरीर पसेव सनेह में ॥
इन रोगनकी औषध देहुँ सुनायकै ।
भिन्न भिन्न मैं कहौं तोहिं समुझायकै ॥
कर्म्म करेजवा तोड़िकै सत्य गिलोयले ।
जत्तही की अजवायन आनि मिलोयदे ॥
चित्त चिरायता न्याय पीत पीपर भली ।
शब्दवर्णन । ४३६
नेम नोन सेंधकी नीकी सी डलीं ॥
हित के बर्तन माहीं तिन्हें भिजोयके ।
परमप्रेम जल तामें डारि समोयदे ॥
शील शिलापर पीसो छानि उमंगसों ।
पीवतही सब रोग नशेंगे अंगसों ॥
शुद्ध सुदर्शन चूर्ण हैगो स्वादही ।
ताके पाये जाय जगत की ब्याधही ॥
दया क्षमा सन्तोष यही माजून है।
होय अधिक आनन्द तत्त्व पदको लहै ॥
गुरु शुकदेव बतावैं औषध सार है।
चरणदास जो खाय कष्ट कोइ ना रहै ॥
राग धनाश्री ॥
मन में दीरघ भये विकारा ।
सतगुरु साहव वैद मिले बिनु कटै न रोग अपारा ॥
त्रैगुण के त्रैदोष पगो है काम क्रोध ज्वर जारा ।
तृष्णा वायु उठी उर अन्तर डोलत द्वारहि द्वारा ॥
विषय वासना पित कफ लागो इन्द्रिन के सुखसारा ।
सत्संगति रस करवा लागे करत न अङ्गीकारा ॥
सत पुरुषन को कहा न मानै शील क्षमा नहि धारा ।
रसना स्वाद तजौ नहिं मूरुख आपन पौ न सँभारा ॥
चरणदास शुकदेव मिले जब औषध ज्ञान विचारा ।
तनमनको सब रोग मिटायो आवागमन निवारा ॥
राग केदारा ॥
भाई रे विषमज्वर जग व्याधि ।
गुरू हमारे दई औषध खाय रहनी साधि ॥
३०
४४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुद्ध चूरणहै सुदरशन निबल लखि मोहिं दीन ।
खात तन के कष्ट नाशौं रोग मन है क्षीन ॥
ज्ञान योगरु भक्ति त्रिफला धारणा नैपाल ।
रहे सतसंगति भवन में आश लगै न ब्याल ॥
कनककामिनि पथ बतायो भूलि कर न अहार ।
अति अजीरण होत इनते बढ़त बिकट विकार ॥
चरणदास शुकदेव कहिया औषधी निज सोय ।
विषम वेदन होय भारी जाहि क्षण में खोय ॥
गीत सावन के गावने का ॥
सखी सजनी हे तेरो पिया तेरे पास ।
अरी बौरी इत उत भटकी क्यों फिरैजी ॥
सखी सजनी हे सुरति निरति कर देख ।
अरी बौरी अपने महल रंग मानिये जी ॥
सखी सजनी हे मान अहूं सब खोय ।
अरी बौरी यह यौवन थिर ना रहै जी ॥
सखी सजनी हे बालम सन्मुख होय ।
अरी बौरी पिछली अरु सब खोइये जी ॥
सखी सजनी हे पिया मिलन कोरी साज ।
अरीबौरी न्हाय शिंगार बनाइये जी ॥
सखी सजनी हे चितकी चौकी धराय ।
अरी बौरी नायन सुमति बोलाइये जी ॥
सखी सजनी हे मनको कलश बनाव ।
अरी बौरी ज्ञानको नीर भराइयेजी ॥
सखी सजनी हे सच रचा अग्नि जराव ।
शब्दवर्णन । ४४१
अरी बौरी नीर गरम करि न्हाइयेजी ॥
सखी सजनी हे योग उबटनो लगाव ।
अरी बौरी कर्म को मैल उतारियेजी ॥
सखी सजनी हे करणी कंगही बहाव ।
अरी बौरी वेणी मुक्ति गुंधाइये जी ॥
सखी सजनी हे गुरूके चरण चितलाव ।
अरी बौरी सतसंगति पग लागियेजी ॥
सखी सजनी हे लाज सिंदुर निकासि ।
अरी बौरी खोलि शिंगार बनाइयेजी ॥
सखी सजनी हे नवधा भूषण धार ।
अरी बौरी जासों पिया रिझाइयेजी ॥
सखी सजनी हे प्रीति को काजल आंज ।
अरी बौरी प्रेम की मांग सँवारियेजी ॥
सखी सजनी हे बुधि बेसरि सजिलेहि ।
अरी बौरी पान विचारि चबाइयेजी ॥
सखी सजनी हे दया कर मेहँदी लगाव ।
अरी बौरी सांचो रंग न उतरैजी ॥
सखी सजनीं हे धीरज चूनरि लाल ।
अरी बौरी नख शिख शील शिंगारियेजी ॥
सखी सजनी हे काम क्रोध तजि लोभ ।
अरी बौरी मोह पीहर सों जिन करौजी ॥
सखी सजनी हे पांच सहेली साथ ।
अरी बौरी इनको संग न लीजियेजी ॥
सखी सजनी हे चालौ पियाकेरे पास ।
अरी बौरी सुपमन बाट सोहावनीजी ॥
४४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सखी सजनी हे गगन मण्डल पगधार ।
अरी बौरी पीय मिलै दुख सब हरैंजी ॥
सखी सजनी हे निर्गुण सेज विछाव ।
अरी बौरी हिलि मिलिकै रँगमानिये जी ॥
सखी सजनी हे पावैगी अटल सुहाग ।
अरी बौरी अजर अमर घर निर्मलेजी ॥
सखी सजनी हे गुरु शुकदेव अशीश ।
अरी बौरी चरणदास मनसा फलै जी ॥
भागीसाथन हे इह भूलैरी मतभूल ।
अरी हेली भर्म भूमि या देशकीजी ॥ भागीसाथनहे ।
बदला मायाकोरी रूप अरी हेली कुमति बूंदजित तित परैंजी ॥
भागीसाथनहे । कर्म वृक्षकीरी बेलि अरी हेली बारी फल लगि
विष भरेजी ॥ भागीसाथनहे । दुर्मति हरी हरी दूब अरी हेली
छलरूपी फूले फूल हैं जी ॥ भागीसाथनहे । त्रैगुण बोलत मोर
अरी हेली दम्भ कपटबकुला फिरैंजी ॥ भागीसाथनहे । पाप
पुण्य दोउ खम्भ अरी हेली नाग¹ स्वर्ग झोटा लगैजी ॥ भागी
साथनहे । मैं मेरी बँधी डोर अरी हेली तृष्णापटरी जित धरी
जी ॥ भागीसाथनहे । झूलत चावहि चाव अरी हेली नर नारी
सब भुलईंजो ॥ भागीसाथनहे । तपसी योगी गये झूल अरी
हेली फल चाहत अरु कामनाजी ॥ भागीसाथनहे । आशा
झुलावत नारि अरी हेली पांच पचीस मिलि गावईंजी ॥ भागी
साथनहे । या जगमें ऐसी भूल अरी हेली चरणदास झूलत
बचैजी ॥ भागीसाथनहे । इत तजि उतकोरी चाल अरी हेली
अमरनगर शुकदेव के जी ॥
१ पाताल ॥
शब्दवर्णन । ४४५
राग बरवा ॥
साधौरी संगत भवँरा दुर्लभ पइये लीजैजी तन मन
भौँराजी । जी मानै साधौरी संगत भवँरा प्यारीही लागै
आदि अनादी भवँरा कौने लखावै अपने सतगुरुजी संतोष
भवँराजी । जी मानै नरक निवारण सतगुरु प्यारोही लागै ॥
आपसकी चर्चा भवँरा कौने सुनावै अपने गुरु भाईजी संतोष
भवँराजी । जी मानै गुरुका तौ छोना भई या प्यारोही लागै ॥
आछे आछे लक्षण भवँरा कौने जुलावै अपने रहनीजी
संतोष भवँराजी । जी मानै कर्म छुटावन रहनी प्यारीही
लागै ॥ आछे आछे परचा भवँरा कौने दिखावै अपनी मुक्ति
संतोष भवँराजी । जी मानै काया जीतावन करणी प्यारीही
जागै ॥ आछी आछी वाणी भवँरा कौने उठावै अपने अन-
भैजी संतोष भवँराजी । जी मानै बुधिकी तौ मांजन अनभै
प्यारीही लागै ॥ चरणदास को तुरिया भवँरा कौने बसावै
अपने शुकदेवजी संतोष भवँराजी । जी मानै सिरका तौ
छत्तर शुकदेव प्यारोहो ॥
राग बिलावल ॥
अजब फकीरी साहबी भागनसौं पइये ।
प्रेमलगा जगदीश का कछु और न चहिये ॥
राव रंककौ सम गिनै कछु आशा नाहीं ।
श्राठ पहर सिमटे रहैं अपनेही माहीं ॥
वैर प्रीति उनके नहीं नहिं वाद विवादा ।
रूठे से जगमें रहें सुनैं सु अनहद नादा ॥
जो बोलै तौ हरिकथा नहिं मौनै राखैं ।
मिथ्या करुवा दुर्वचन कबहूं नहिं भाखैं ॥
४४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जीव दया अरु शीलता नखशिख सों धारैं ।
पांचौ चेले वश करें मन सों नहिं हारैं ॥
दुख सुख दोनों के परे आनँद दरसावै ।
जहां जाय अस्थल करें माया पवन न जावै ॥
हरिजन हरिके लाड़िले कोइ लहै न भेवा ।
शुकदेव कही चरणदाससों करि तिनकी सेवा ॥
( फुटकर पद )
राग परभाती ॥
और ख्याल सब छाड बावरे गोविंद के गुन गावरे ॥
श्रीहरिकथा सुनी नहिं कबहीं चाले जन्म गुमावरे ।
बिनाभक्ति चौरासी लखमें फिर फिर गोते खावरे ॥
सत्संगत की नाव बैठके उतर चलो दरियावरे ।
पैली पार मिलें हरि प्रीतम ज्ञानकी बल्ली लगावरै ॥
नौधाभक्ती करो कृष्णकी अनहद ताल बजावरै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जोतिमें जोति मिलावरै ॥
गज़ल ॥
मुझे कृष्ण के मिलने की आरज़ू है ।
शबो रोज दिल में यही जुस्तजू है ॥
नहीं भाती है मुझको बातें किसी की ।
सुनी जब से उस यार की गुफ्तगू है ॥
नहीं मुजको मतलब जहाँ में किसी से ।
चुभा जबसे दिलमें सनम खूबरू है ॥
जो आशक़ है उसका नहीं उस्से ग़ाफ़िल ।
तड़पता अज़ल से खड़ा रूबरू है ॥
शराबे मुहब्बत पिई जिसने, यारो ।