भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तब को ज्ञानी ज्ञान कहां है ज्ञेय कहां ठहराना ।
ध्यानी ध्येय जहां नहिं पइये तहां न पइये ध्याना ॥
जब कहां बंध मुक्त भुगतइया काको आवन जाना ।
को सेवक अरु कौन सहायक कहां लाभ कित हाना ॥
जब को उपजै कौन मरत है कौन करै पछिताना ।
को है जगत जगत को कर्त्ता त्रैगुण को अस्थाना ॥
तू तू तू अरु मैं मैं नाहीं सबही दे बिसराना ।
चरणदास शुकदेव कहां है जो है सो भगवाना ॥
राग केदार व सोरठ ॥
सो लखि हम निर्गुण झरि पाई ।
जहां न वेद कतेब पहुँचै नहीं ठकुराई ॥
चारवरण आश्रम नहीं कर्म ना काई ।
नरक अरु वैकुंठ नाहीं नहीं तन ताई ॥
प्रेम अरु जहाँ नेम नाहीं लगन ना लाई ।
आठ अँग जहँ योग नाहीं नहीं सिद्धाई ॥
आदि अरु जहाँ अंत नाहीं नहीं मध्याई ।
एक ब्रह्म अखण्ड अविचल माया नाराई ॥
ज्ञान अरु अज्ञान नाहीं नहीं मुकताई ।
चरणदास शुकदेव सम तहाँ दुई जरिजाई ॥
राग सोरठ व नट बिलावल ॥
सो नैना मोरे तुरिया ततपद अटके ।
सुरति निरतिकी गम नहिं सजनी जहां मिलनको लटके ॥
भूला जगत बकत कछु औरै वेद पुराणन ठटके ।