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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

शब्दवर्णन । ३४३
चरणदास शुकदेव कहत हैं निजकरि मूल गहीजै ।
पारब्रह्म जिन सृष्टि उपाई ताओरी चितदीजै ॥
राग बिलावल ॥
नमो नमो श्रीरामजी देवनके देवा ।
शिव नारद सनकादिलौं कोइ लहै न भेवा ॥
एजी निरगुणसों सरगुण भये कौतुक विस्तारे ।
साधुन की रक्षा करी दानव दल मारे ॥
दसरथसुत भूले कहें कोई जानत नाहीं ।
इकशत अंड दिखाइया अपने मुख माहीं ॥
गौराने परचो लियो सियभेष बनायो ।
देखे रूप अनन्तही जब मन बौरायो ॥
आदि निरंजन एक तू दूजा नहिं कोई ।
शुकदेव कहीं चरणदासको नित सुमिरौ सोई ॥
नमो नमो गोविन्दजी हूं दास तिहारी ।
चौरासी दुख सब हरो आवागमन निवारो ॥
कर्मनको प्रेरो फिरूं नहिं पायो नेरो ।
अबके ऐसी कीजिये दीजै चरणबसेरो ॥
पतितउधारण तुम सुने वेदन में गाये ।
अजामील गणिका तरे ले पार लगाये ॥
एजी गुरु शुकदेव बताइया गही तुम्हारी आसा ।
आन धर्मको छोड़िकै भयो चरणहिंदासा ॥
राग जैजैवन्ती ॥
आदितौ सनातन सोई अज अविनाशी है साईं ॥ जाको
नहिंवारपार निर्गुणको तत्त्वसार तासों भयो जग सब आप
२४

३४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निर्वासी है । अद्वै निराकार जानौ सतचिदानन्द मानौ पुरुष
को रूपधरि माया परकासी है ॥ नेति नेति वेद कहैं अस्तुति
माहीं रहैं भेद कछु नाहीं लहैं थकथक जासी है । योग ध्यान
आवै नाहीं ज्ञानसों न गहौजाई भक्तों के हिये माहि सदा जो
विलासी है ॥ सन्तों हेतु देह धरै आयके सहायकरै पृथ्वी को
दुःख हरै घटघटवासी है। एहो चरणदास जन वासों क्यों न
लावो मन शुकदेव कृपाघन खोलिदइ गांसी है ॥
सावरो सलोनोप्यारो मेरे मनभायो है माई ॥ कहा कहूं शोभा
वाकी तीन लोक माया जाकी शेषहू की रसना थाकी पारहून
पायो है । निरगुण निराकार कोऊ कहा जानै सार सन्तों की
सहायकाजे देह धरि आयो है ॥ ब्रजहू में कौतुक कीन्हे सन्तन
को सुखदीन्हे मुरली बजाय गाय रीझिकै रिझायो है । योगी
जाको ध्यान लावैं ब्रह्मा अरु वेदगावैं ताको तौ यशोदा माता
गोदमें खिलायो है ॥ चरणदास सखीपर शुकदेव कृपाकीन्ही
बांकोसो विहारी एक पलमें दिखायो है ॥
बधाई राग मलार ॥
बधाई सबही ब्रज सोहाई ।
मुदितभये वसुदेव देवकी मनमें अति अधिकाई ॥
पहुँचे जाय महरि घरमाहीं काहू भेद न जानो ।
यशुमति रानी बालक जन्म्यो सबने योंकर मानो ॥
घर घर मंगलचार भये हैं बन्दरवार बँधाईं ।
नूतन बस्तर पहिरि पहिरि कै नारि सबै घिरिआई ॥
करि कौतूहल मिलि मिलि गावत करैं उछाह घनेरा ।
याचक भीर बहुत भइ द्वारे बजत दमामे भेरा ॥

शब्दवर्णन । ३४५
जिसलायक देखा सो दीन्हा करी शुश्रुषा भारी ।
इक आवत इक जात बिदाहो देत अशीश महारी ॥
धनिगोकुल धनिंपौरि भवनधनि आये हैं जगदीश ।
शिव ब्रह्मादिक ध्यान धरत हैं लख ईशनको ईशा ॥
दुष्टदलन सन्तन सुखकाजैं लीन्ह्यो है औतारा ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जगपति सिरजनहारा ॥
नन्दघर कौतुक करन नवीने ।
जो जो वचन किये थे आगे सो आ पूरण कीने ॥
भक्तबछल करतार गुसाईं धरिआये औतारा ।
रक्षाकारण साधु ऋषिनकी भूमि उतारण भारा ॥
जब जब भार बढ़त पृथ्वीपर तब तब होत सहाई ।
मर्यादा पुरुषोत्तम येही बिगरी सबै बनाई ॥
निरगुणसों सरगुण वपुधारे कष्ट निवारण काजै ।
योगेश्वर जेहि ध्यान लगावैं नामलिये अघ भाजै ॥
भाग बड़े यशुमति रानी के दर्शन दीन्हें आई ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सुर मुनि करी बधाई ॥
जगतपति देखि महरघर आये ।
बाल चरित्र ही दिख्‌लावन आनँद अधिक बधाये ॥
तप कीन्हों थो नन्द यशोदा पिछले जन्म अघाई ।
वरमांगो थो हम सुत होके खेलो भवन मँझाई ॥
वचन न मोड़ा आय विराजे भक्तोंवश सुखदाई ।
जो जो चाहो सो सुखदीयो हुये कुँवर कन्हाई ॥
संग लियो समीप मुक्तिको ब्रज में अवन कियो है ।
सुख उपजायो नर नारिनको दर्शन आय दियो है ॥

३४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब जब प्रकटे चारों युगमें सत कलि द्वापर त्रेता ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सन्तनही के हेता ॥
सखीरी आज गोकुल भाग बड़ाई ।
दर्शन दे वसुदेव देवकी नँदघर प्रकटे आई ॥
भादौंमास वदी बुध आठौं ग्रह नक्षत्रर नीके ।
यशुमति रानी गोद सिरानी भये मनोरथ जीके ॥
भयो उछाह स्वरग के माहीं देव सभी हर्षाये ।
अपने अपने बैठि विमानन पुष्प अधिक वर्षाये ॥
यह धरती परफुल्ल भई है फूलउठा वन सारा ।
कालिन्दी को बड़ो उमाहो करिहैं लाल विहारा ॥
किरपासागर होय उजागर मर्यादा बँधबांधन ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कारण अपने साधन ॥
सखीरी सुन देख अभी मैं आई ।
यशुमति रानी बालक जायो यहतोहिं आनि सुनाई ॥
नयनि डोलै हँसि हँसि बोलै घर घर कहत बधाई ।
भयो उछाह सकल गोकुल में बातभई मनभाई ॥
सुन सुन आपस में मुसकाने देन बधाई लागे ।
भूषण वस्तर लगे सवाँरन नरनारी रसपागे ॥
वनसों रहे गये नँदद्वारे ग्वाल सभी हरषाये ।
बड़ो पौरि के आगे याचक गावनहीं को आये ॥
मैं घर जाऊ वनकर आऊं तुमहूं देह शिंगारो ।
साथ चलेंगी जाय मेलेंगी होइहै कौतुक भारो ॥
शुकदेवा का मुँह देखेंगी करिहैं अधिक हुलासा ।
ऐसे कहि वह भवन सिधारी भनै चरणहीदासा ॥

शब्दवर्णन । ३४७
राग हिंडोलनो ॥
झूलत हरिजन सन्तभक्ति हिंडोलने ।
ररा ममा दृढ़खंभ रोपे प्रेम डोरी लाय ।
टेक पटरी बैठि सजनी अतिअनन्द बढ़ाय ॥
ध्यानके जहाँ मेघ बरसें होय उमँग हुलास ।
गुरुमुखी जहाँ समझ भीजैं पूरण हरिके दास ॥
बुद्धि विवेक विचारि गावैं सखी सहेली साथ ।
अगमलीला रटैं सजनी जहां ब्रह्मविलास ॥
परमगुरु श्रीजनक झूलैं झूलैं गुरु शुकदेव ।
चरणदासी सखी सदा झूलैं कोइ न पावै भेव ॥
राग हेली ॥
और न मेरे कोय हेली ।
प्राणपियारे लालजी ॥ रोम रोमरोम वेई रमेरी अरी हेली तन
मन व्यापक सोय ॥ जित देखों तित लालकोरी अरी हेली दूजा
नाहीं और ॥ आदि अन्त है लालजी सर्वमयी सबठौर ॥
देश काल सबलालहैं री अरी हेली अर्धऊरध है लाल । दहिने
बायें लालजी दशोंदिशा में लाल ॥ सोवतही में लालहैं री
अरी हेली जाग्रतहीमें लाल । माहिं सुषोपति लालजी तुरियाही
में लाल ॥ ज्ञान ध्यान सब लाल हैंरी अरी हेलीलालही गुरु शुकदेव
चरणदासी है लालकी बिरला जानै भेव ॥
जो होवै हो हरिदास हेली एते कुलतारै वही ॥ फल न
मुक्तिचाहै नहींरी अरी हेली भक्ति करै निर्वास ॥ बीस चार कुल ददा
केरी अरी हेली बीस नाना के जान । सोलह कुल ससुरारके
द्वादश सुता बखान ॥ बहनी के ग्यारह तरेरी अरी हेली दश
भूवा के पार । मौसी के कुल आठही वेद कहत हैं चार ॥ अष्टादश

३४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
यों कहें री अरी हेली कहें साधु अरु सन्त । चरणदास शुकदेव
भी कहें कमलाको कन्त ॥
छूटे आल जंजाल हेली चरण कमल के आसरे ॥
भर्मभूत सबही छुटेरी अरी हेली सौन नक्षत्रनाल ॥ जन्तर
मन्तर सबछुटेरी अरी हेली छूटे वीर मशान । मूठ डीठ अब
ना लगै नहीं घात को बान ॥ शनैश्चरबल अब ना चलैरी
अरी हेली नहीं राहु अरु केतु । मंगल बृहस्पति ना दहैं नहीं
भोग उनदेतु ॥ ज्योति बालपर सो नहींरी अरी हेली मानूं न
देवी देव । सतगुरु मोहि बताया सांचो झूठो भेव ॥ अठसठ
तीरथ ना फिरूंरी अरी हेली पूजूं न पाथर नीर । श्रीशुकदेव छुटा-
इया जन्म मरणकी पीर ॥ निश्चलहो हरि की भईरी अरी हेली
सुमिरूं निर्मलनावँ । अनन्य भक्ति दृढ़सूं गही मारग आन न
जावँ ॥ गोविन्द तजि औरन भजैरी अरी हेली ताके मुहड़े
[L1

शब्दवर्णन । ३४६
कमलनैन केशव^३७ मधुसूदन^३८ सबमें^३९ सबसे न्यारा^४० ॥
हृषीकेश^४१ मुरलीधर^४२ मोहन^४३ ॐ^४४ अखिल^४५ अयोन^४६ ।
भगवंत^४७ वासुदेव^४८ भगवाना^४९ ज्ञानी^५० ध्यानी^५१ मोनी^५२ ॥
दीनानाथ^५३ गोपाल^५४ हरी^५५ हरै गरुड़ध्वज^५६ घनश्यामा^५८ ।
भक्तिवछल^५९ अरु देवकिनन्दन^६० करता सब विधिकाम^६१ ॥
आदिप्रधान^६२ माधुरीमूरति^६३ धरणीधर^६४ बलवीरा^६५ ।
नन्दनंदन^६६ अरु यशोदानन्दन^६७ सुन्दर श्याम शरीरा^६८ ॥
परशुराम^६९ नरसिंह^७० विश्वंभर^७१ अचल^७२ अखण्ड^७३ अरू^७४पी ।
ईश^७५ अगोचर^७६ और जगतगुरु^७७ परमानँद^७८ बहुरू^७९पी ॥
करुणामय^८० कल्याण^८१ अनन्ता^८२ दयासिंधु^८३ वनवारी^८४ ।
धारण शंखचक्र^८५ रुकिमणि^८६पति आनंदकन्द^८७ विहा^८८री ॥
परमदयालु^८९ मनोहर^९० नरहरि^९१ कृपा^९२निद्धि फलदाता^९३ ।
कंसनिकन्दन^९४ रावणगंजन^९५ जगपति^९६ लक्ष्मीनाथा^९७ ॥
जगन्नाथ^९८ अरु बद्रीनाथा^९९ निरगुणं^१०० सरगुणं^१०१धारी ।
दा^१०२मोदर रघुवर^१०३ सीतापति रामा^१०४ कुंजविहा^१०५री ॥
दुष्टदलन^१०६ सन्तन्को रक्षक^१०७ सकल सृष्टिको ^१०८सांई ।
दुःखहरण के कौतुक अनगिन शेष पार नहिं पाई ॥
सौ अरु आठ नामकी माला जो नर मुखों उच्चारै ।
अपने कुलकी सारी पीढी एकअरुसौ को तार ॥
गुरु शुकदेव मंत्र निज दीन्हो रामनाम ततसारा ।
चरणदास निश्चय सों जपकरि उतरो भवजलपारा ॥
राग केदारा ॥
हरिको सुमिरि संकट हरन ।
कोटि कष्टनिवारि डारै जगत पोषण भरन ॥
भक्ति पूरण देखि निश्चल अनन्य बाधों परन ।

३५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अग्नि में प्रह्लाद राखो दियो नहीं जरन ॥
गिरिशिखरसों डारि दीन्हो लगो करुणाकरण ।
दीन जानि संभार लीन्हो कियो ठाढ़ो धरन ॥
खम्भ बांधो खङ्ग काढ्यो दुष्ट लागो अरन ।
अब बता तेरो राम कितहै गहौ वाकी शरन ॥
ढीठ हो प्रह्लाद भाष्यो डारि शंका डरन ।
मोमें तोमें खङ्ग खम्भे मध्य नारी नरन ॥
खम्भ फटकर भये परगट धरो नरसिंह वरन ।
असुर मारो जन उबारो पुहुप वरषे सुरन ॥
मोहिं गुरु शुकदेव कहिया सेव सोई चरन ।
चरणदास उपासना दृढ़ होय तारण तरन ॥
राग अलहिया ॥
सुमिरु मन राम नाम ततसार ।
जिन जिन सुमिरो सो सो उतरे भवसागर सों पार ॥
वेद पुराण और षटमाहीं तारण को यहि योग ।
जौपै पांचौ प्रेत निवारै अरु इन्द्रिन के भोग ॥
साधन संयम पूजा अर्चन और करै तपदान ।
नाम समान न फल काहू में करि देखी पहिंचान ॥
जो जप करै धरै हिरदै में आशा सकल बिड़ार ।
तीन लोक में धनि धनि होवै शोभा अगम अपार ॥
सब धर्मन परधान नाम है सब इष्टन शिरमौर ।
निश्चय पकड़रहो याही को सकल विकल तजि दौर ॥
तामें ज्ञान भरोही दीखै पावै ब्रह्म विचार ।
गुरु शुकदेव दियो दृढ़ मोकूं चरणहिं दास सँभार ॥

शब्दवर्णन । ३५१
राग बिलावल ॥
अब तू सुमिरण कर मन मेरे ।
अगले पिछले अब के कीये पाप कटैं सब तेरे ॥
यम के दंड दहन पावककी चौरासी दुख प्रेरे ।
भर्म कर्म सबही कटिजैहैं जगत् ब्याध उरमेरे ॥
पैहै शक्ति युक्ति गति आनँद अमरहिलोक बसेरो ।
जन्मै मरै न योनि आवै या जग करै न फेरो ॥
सुमिरण साधनमाहिं शिरोमणिजो सुमिरण करि जानै ।
काम क्रोध मद पाप जरावै हरि बिन और न मानै ॥
गुरु शुकदेव दियो है सुमिरण बिन जिह्वा करिलीजै ।
चरणदास कहैं घेरि घेरिकरअर्धउर्ध मन दीजै ।
राग केदारा ॥
अरे मन करो ऐसो जाप ।
कटैं संकट कोटि तेरे मिटैं सगरै पाप ॥
चेत चेतन खोज करले देख आपा आप ।
कागसों जब हंस होवै नामके परताप ॥
ध्यान आतम सुरति राखौ छुटै त्रैगुण ताप ।
सुरतिमाला सुमिरि हिरदै छाँड़ सकल संताप ॥
परा भक्ति अगाध अद्भुत विमल अरु निष्काम ।
चरणदास शुकदेव कहिया बसैं निजपुर धाम ॥
राग भैरौं ॥
राम राम राम राम राम राम गावो ।
मनके रोग सकल बिसरावो ॥
नाम प्रताप शिला जलतारी ।

३५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सोई नाम जपौ नरनारी ॥
नाम लेत प्रह्लाद उबारो ।
परगट है हिरणाकुश मारो ॥
पतित अजामिल सबजगजानै ।
नामलेत चढ़ि गयो विमानैं ॥
सुवा पढ़ावत गणिका तारी ।
नामलेत निजधाम सिधारी ॥
सोई नाम नारदमुनि गायो ।
वेदव्यास सुख प्रकट जनायो ॥
हरिके नाम को करो विचारा ।
सतसंगतिमिलि उतरौ पारा ॥
शिवब्रह्मादिक नाम उपासी ।
आठसिद्धिनवनाम किदासी ॥
शुकदेव गुरुने नाम बतायो ।
चरणदासहरिसों चितलायो ॥
राग बिलावल ॥
रामनाम चारों वेदको कहियत है. टीको ।
पाप ताप दुख द्वंद्वकूं मेटनकूं नीको ॥
एजी जेहि सुमिरे रक्षाकरी प्रहलाद उबारो ।
निर्गुण सों सर्गुण भयो जानत जग सारो ॥
एजी जप तप संयम योगमें सबहुन परभारी ।
नामलिये सबही तरैं बालक नर नारी ॥
एजी जो हिरदै दृढ़करगहै हरिदर्शन पावै ।
चौरासी बन्धन कटैं आवागमन नशावै ॥
एजी गुरु शुकदेव दयाकरी हरिनाम बतायो ।

शब्दवर्णन । ३५३
चरणदास आधीनके निश्चय मनआयो ॥
सांचा सुमिरण कीजिये जामें मीन न मेख ।
ज्यों आगे साधुन कियो वाणी में देख ॥
एजी टेक गहौ दृढ़भक्ति की नौधा हिय धारि ।
सन्तन की सेवा करो कुलकानि निवारि ॥
एजी जासों प्रेमा ऊपजै जब हरि दरशाय ।
आगे पीछेही फिरै प्रभु छोड़ि न जाय ॥
एजी चारि मुक्ति वांदी अष्टैसिद्धि चरननमाहिं ।
तीरथ सब आशा करैं अध देख नसाहिं ॥
एजी कहैं गुरू शुकदेवजी चरणदास गुलाम ।
ऐसी धारन धारिये रहिये निष्काम ॥
ऐसा सुमिरण कीजिये सुनिहो मनमेरे ।
रसना राम उचारिये कर माला फेरे ॥
एजी निन्दा अकस न राखिये काहू दुखनहिं दीजै ।
सन्तन सूं सनमुख रहो गुरसेवा लीजै ॥
एजी भूखे भोजन दीजिये प्यासे नीर पियावो ।
सबसे नीचा ह्वै चलो अभिमान नशावो ॥
एजी सतसङ्गति में मिलिरहौगुरुमतसूं रहिये ।
आन धर्म नहिं चालिये यमदण्ड न सहिये ॥
एजी तामसकूं विषज्यों तजो शुकदेव बतावै ।
चरणदास हरि हरि जपै मुकता ह्वै जावै ॥
थोथे सुमिरण कहा सरे ।
मनकेरौग शोक नहिं खोये हिंसा डूबे अकसंजरे ॥
एजी नारी सुतसूं मोह कियौहै नेक न हरिके प्रेमअरे ।
१ टहलुई २ गुस्सा ॥

३५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
कुल नाते परिवार सँभारे साधनकी नहिं टहल करे ॥
राजी माला तिलक सुधारि सवाँरे राखत छलवल मकर घने ।
अन्तर और निरन्तर औरै सिंह गऊमुखं रहत बने ॥
राजी ऐसी भक्ति मुक्ति नहिं पावै करम लगैं अरु नरक परे ।
यमके दण्ड दहन पावककी जनम मरण योनाहिं टरे ॥
राजी लक्षण प्रेम सहित जप कीजै भीतर बाहर उघरनचे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरीरीझैं जब व्याधि दचे ॥
मालाफेरी कहाभयो
अन्तर के मनको नहिं फेरा पाप करत सब जन्मगयो ॥
पर निन्दा परनारि न भूलो खोटकपटकी ओरनयो ।
काम क्रोध मद लोभ न खोये है रह्यो मूरख मोहभयो ॥
दुनियां सांचसमझघर कीन्हो धन जोरनको परनलयो ।
दया धर्म दोउ मारग छोड़े मँगतन को नहिं दानदयो ॥
गुरुसों झूठ भगल साधन सों हरिको नाहिं नेहजयो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कैसे कहिये मुकतहयो ॥
राग हेली ॥
और उपासन कोय हेली टेक हमारे नामकी ।
आन शरण जाऊं नहींरीअरी हेली होनी होयसो होय ॥
योग यज्ञ तप नामहींरी अरी हेली नाम.नक्षत्र वार ।
सकल शिरोमणि नाम है तन मन डारूं वार ॥
अठ सठ तीरथ नामहींरी अरी हेली नाम हमारे नेम ।
नामहीं सूं राची रहूँ नाम हमारे प्रेम ॥
वरत हमारे नामहारी अरी हेली इष्ट हमारे नाम ।
अर्थ धर्म फल नाम हीं नाम मुक्ति को धाम ॥

·शब्दवर्णन । ३५५
पढ़न लिखन सब नामहैरी अरी हेली नाम ग्रह सब देव ।
जो कुछ है सो नामहीं नाम हमरो भेव ॥
राम नाम शुकदेव दियोरी अरीहेली सों राखो मनमाहिं ।
चरणदास के नामहीं इह सम तुल कछु नाहिं ॥
अथ सगुण उपासना अंग राग शब्दों के दोहा ॥
धन सतगुरु शुकदेवजी, मेरी करी सहाय ।
निज वृन्दावन धामको, लीला दई दिखाय ॥
अब कछु कौतुक रासको, वरणतहै चरणदास ।
लाल लाड़िली कृपा सों, पाव निज ब्रजवास ॥
राग रासविहागरा ॥
नृत्य करत छविसों बनवारी ।
टेरिलई सबही ब्रज वनिता मुरली मधुर बजाय विहारी ॥
सुनत श्रवण धुनिहोय प्रेमवशविकलभइँ सुन्दर सुकुमारी ।
गृहके काज लाज तजि पियकी उठि धाई तन सुरति बिसारी ॥
आयेगावन छहों रागमिलि पांच पांच इक इककी नारी ।
आठ आठ इक इकके बेटा मूरतवन्त स्वरूप महारी ॥
ताल वीण मुरचंग मँजीरा तनन तनन तँबुरा गति न्यारी ।
ताधीनाधीना ताधीना बजत पखावज घुंघुरू झनन झनन झन-
कारी ॥ इक इक गोपियनके संग इक इक सुन्दर भेष धरो
गिरधारी । ऐसोरच्यो रासको मण्डल मध्यराधिका कृष्ण
मुरारी ॥ गावत गीत बढ़ाय परस्पर मान करत पियसों पिय
प्यारी । लेत मनाय लाड़िलो प्यारो हँसि हँसि विहरत दै
दै तारी ॥ ततथेई ततथेई थेइ थेइ ततथेई उरप तुरप सांगीत
उचारी । नटवररूप करो मनमोहन शेषथको वरणत शोभारी ॥
भये चकित सुरमुनि ऋषि किन्नर बाढ़ी रैन शरद उजियारी ।

⸱ ३५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी अद्भुत लीलापै बलिहारी ॥
रास राग भैरौं ॥
देख सखी रास रच्यो सांवरे बिहारी । ब्रह्मा शिव इन्द्र
शेष नारद से थकित भये ऐसो कवि कौन करै वरणन उप-
मारी ॥ सोहै सिर मुकुट और कुण्डल छवि तिलक भाल
किंकिण कटि पीताम्बर नूपुर झुनकारी । बहुत नारि सुघर
सखी राधाजू चन्द्रमुखी ललितादिक सह॑चरी श्रृङ्गार सों
सवाँरी ॥ कोऊ तँबूरा कोउ मुरचंग कोऊ बजावै गति मृदंग
कोऊ ताल देत कोऊ स्वर उठान भारी । बंसी में करत गान
बाँकीसी मधुरतान श्यामा जब करत मान श्यामलेँ मनारी ॥
कबहूं करजोर दोऊ नाचतहैं नवकिशोर कबहूँ हरि नृत्यकरत
कबहूं पियप्यारी । ता ता ता ता ता ता थेई थेई थेई द्वैरही बाढ़ी
निशि शरददेखि हरिकी नृतकारी ॥ गौवन तृण छाँड़ि दियो
बछरन पय नाहिं पियो मुरली धुनि सुनतमोहे मुनि जन व्रत
धारी शुकदेवजी गुरुकौं चरणदास बहु प्रनाम करै रास
को विलास दियो परगट दरशारी ॥
रास राग बिहागरा ॥
रास में निरत करत बनवारी ।
मुदित मनोहर रंग बढ़ावत सँग वृषभान दुलारी ॥
मोरमुकुट छवि शीश विराजत नाक बुलाक सुढारी ।
कर मुरली कटि काछनि काछे अलकैं घुंघुरवारी ॥
राधाजू के शीश चन्द्रिका नीलाम्बर जरतारी ।
गावैं सखी श्याम श्यामा सँग नखशिख रूप उजारी ॥
ताधिनां ताधिनां धीनां बजत पखावज ताल बीण गति न्यारी ।
१ सङ्गकी सहेली ॥

शब्दवर्णन । ३५७
ठनन ठनन ठन नूपुरकी धुनि झनन झनन झनकारी ॥
थेइ थेइ थेइ थेइ नचत दोऊ मिलि विहँसि विहँसि मुसकारी ।
चरणदास शुकदेव दयासू पायो दरश मुरारी ॥
रास रामकली वा भैरौं ॥
नृत्यत गोपाललाल तत्ततता थेई ।
नखशिख श्रृंगार कियें राधा गल बाँह दियें सखियनसंग
नाचत स्वर ताल तान देई ॥ तननन तंबूर गिड गिड धुध-
कधू मृदंग ताल झम झम झै झांझ बजतबीन बाँसुरी । झन-
नन झनकार होत पायल ठनकार राग गावत कल्याण और
नट धनासिरी ॥ कबहूँ लै कान्हरा अलाप कभू सोरठ को
परज अरु विहागरो केदारा आसावरी । कबहूं कै बिभास
मालसिरी ललित रामकली भरहूँ विलावल धुनि धुर्पद को
चावरी ॥ सुन्दर बहु भेष धरें रासको विलासकरें मुनिजन
मनहरें बढ़ो आनँद उं ह ठाहीं । अद्भुत छवि कहा कहूं किरपा
शुकदेव चहूं चरणदास होय रहूं चरणकमल माहीं ॥
रास राग पंचम ॥
सखी दोऊ रसिक प्रीतम पिय प्यारी ।
मिलि खेलत हैं रास छवि कहिन जाई ।
एककी एक सों सरस शोभा बनी निरख सब सुरमुनी रहे
लुभाई ॥ कोऊ कर बनिलै सुधरस्वर तालदै गावत संगीत
रीझत रिझाई । थुंकना थुंगना धुधक धूधूकृत बजत मिरदंग
गति अति सुहाई ॥ तार मुरुचंग स्वरसससों मुरलिका मधुर
धुनि चतुर शारंग बजाई । नचत दोउ भावसों अधिक बहुचाव
सों तत्तथेई थेई थेईलगाई ॥ कबहूं पियप्यारी जू मान करें
लालसों कबहूं भुजगहि पियाले मनाई । धरत सुन्दर डगन

३५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बजत नूपुर पगन हँसत दोउ लसत दिये गरेबाहीं ॥ बढ़ी
निशि शर्दकी कौन वर्णनकरै शेशहू सहसमुख रहे थकाई । कहै
चरणदास शुकदेव किरपा करी ध्यान के माहिं लीला दिखाई ॥
दो० बसरी बैरन बांसुरी, तूही ब्रजके माहिं।
लगीरहत पियमुख जुतू, पलछिन छांड़त नाहिं ॥
जब तू बाजत तानसूं, ए बंशी बड़भाग ।
कसक उठत जियरा जरै, तनमन लागत आग ॥
हमरो पिय तैं वशकियो, करत अधर रसपान ।
कहा टोना कियो जु तैं, बर पाये भगवान ॥
ब्रह्मा भूलो वेदधुनि, शंकर छोड़ो ध्यान ।
चरणदास कहैंसुनिबांसुरी, इन्द्र तज्यो अभिमान ॥
छैल छबीलो लाड़िलो, रंग रँगीलो लाल ।
चरणदास के मन बसो, बंशीधर गोपाल ॥
राग काफी ॥
मोहन प्यारे की बंशी बाजैरी ।
हमकूं जरावत विरह अग्निसों जब अधरनपै राजैरी ॥
लालन मुख लागीरहै निशिदिन नेकन नाहिं न लाजैरी ।
तनक बाँस की बनी बसुरिया गर्भभरी अति गाजैरी ॥
तैं वश कियो शुकदेव हमारो सुनत कलेजो दाझैरी ।
चरणदास कहैं अब कहा कीजै तुही भई सिरताजैरी ॥
बंशीवारे सों नेहरा कीन्होरी ।
काहूको कछु कहो न मानूं यह तनमन वहि दीन्होरी ॥
भर्मत भर्मत बहुतै हारी भटक भटक जग बीनोरी ।
आन देवसों काज न मेरो सांचो प्रीतम चीन्होरी ॥
शोभाको सागर गुणको आगर कुँवरकिशोर नवीनोरी ।

शब्दवर्णन । ३५६
नवल लाड़िलो मोहन सोहन सोई वर वरलीन्होरी ॥
प्रभुको छांड़ भजूं औरनको तौ कहियो बुधिहीनौरी ।
चरणदासको है सुखदायी श्यामसुंदर रँगभीनोरी ॥
वा मुरलियाने हेली मेरे प्राणहरे ।
जब वाजत पियके मुख लागी सुनि धुनि तनकी सुधि बिसरे ॥
ऐसो जप तप कहा कियो है मोहन सोहनलाल बरे ।
जाके रसबस भये श्यामजी ताबिन पलछिन कल न परे ॥
तीनलोक बिच धूम मचाई सुर मुनि ऋषि के ध्यानटरे ।
चरणदास शुकदेव दयासों मनवांछित सब काजसरे ॥
वा मुरलियाके बोल मेरे हिये कसकै ॥
बाजत मान गुमान गरवले करि राखो हरिकों बसकै ॥
बाँकी तान वान ज्यों लागत चुभत कलेजे में धसकै ।
नेक न होत पिया सों न्यारी अधरन के रसके चसकै ॥
कहाकरूं कुछ यतन न दीखै कोई उपाय न होयसकै ।
चरणदास शुकदेव पियारे कवहूँतो वोलेंगे हँसकै ॥
वंशीवारे तू साडी गली आ जावो ।
तैंडे कारण भई बावरी टुक मुख छवि दिखला जावो ॥
व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज तनकी तपत सिरा जावो ।
चरणदास तलफत दर्शन विन शुकदेव दुःख मिटा जावो ॥
राग परज ॥
तुम्हारे रूप लोभानी हो ।
जाति बरन कुल खोयके भइ प्रेम दिवानी हो ॥
खान पान सब सुधि गई और अकबक बानी हो ।
तुम्हरे चरण कमल मन मेरो रहो लिपटानी हो ॥
सुन्दर सूरति सोहनी मेरे नैन समानी हो ।
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३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तुम बिन चैन नहीं दिन राती सुनि पिय जानी हो ॥
दरश दिखावो साँवरे जब हिये सिरानी हो ।
नातर वह गति है है हमरी मीन ज्यों पानी हो ॥
सुख देवो दुख सब हरो काहे बिसरानी हो ।
चरणदासि यह सखी तिहारी मिलजा छानी हो ॥
राग विहागरा ॥
सुधि बुधि सब गई खोयरी मैं इश्क दिवानी ।
तरफतहूँ दिन रैन सखीरी जैसे जल बिन मीननी ॥
बिन देखे मोहिं कल न परत है देखत आंख सिरानी ।
सुधि आये हिय में दव लागै नैनन वर्षत पानी ॥
जैसे चकोर रटत चन्दा को जैसे पपीहा स्वाती ।
ऐसे हम तरफत पिय दर्शन विरह व्यथा इहिभांती ॥
जबते मीत बिछोहा हूवा तबते कछु न सुहानी ।
अंग अंग अकुलात सखीरी रोम रोम मुरझानी ॥
बिन मनमोहन भवन अंधेरो भरि भरि आवै छाती ।
चरणदास शुकदेव मिलावो नैन भये मोहिं घाती ॥
भईहूं प्रेममें चूरहो मोहिं दरशन दीजै ।
हूं तो दासि तिहारी मोहन बेगि खबरिआ लीजै ॥
ज्ञान ध्यान और सुमिरन तेरो तो चरणन चित राखूं ।
तेरोहि नाम जपूं दिन राती तो बिन और न भाखूं ॥
तन व्याकुल जिय रूंधोहि आवत परी प्रीति गलफांसी ।
तुमतो निठुर कठोर महा पिय तुमको आवै हांसी ॥
विरह अग्नि नख शिख सूं लागी मन में कल्पना भारी ।
गिरोहि परत तन सँभरत नाहीं रहत भवन में डारी ॥
कै विष खाय तजों यह काया कै तुम्हरे सँग रहसूं ।

शब्दवर्णन । ३६१
चरणदास शुकदेव बिछोहा तेरी सूं नहिं सहसूं ॥
राग कान्हड़ा ॥
तुम बिन अति व्याकुल भइयाँ ।
मोहूंकों दर्श दिखावरे मोहन प्यारे ।
चितवन नैन हँसन दसनन की अटक रही हिय महयां ॥
वह लटकन मटकन चटकन पट मोरमुकुट की छविछइयां ।
अधर मधुर मुरली सुर गावत टेरि बुलावत गइयां ॥
हाहा खाऊं शीश नवाऊं और परूं तोरे पइयां ।
वारीहूं वारी मुख ऊपर दोउ कर लेहुँ बलइयां ॥
अब तौ धीर रहो नहिं रंचक हो शुकदेव गुसइयां ।
चरणदासी भइ प्रेम बावरी आनि गहो क्यों न बहियां ।
राग पर्ज ॥
तुम बिन कैसे जीऊं प्यारे नँदलाल ।
भूख प्यास कछु लागत नाहीं तन की सुधि न सँभाल ॥
कल न परत कल कल अकुलावौं छिन छिन छिन बेहाल ।
विरह व्यथा को रोग बढ़ो है पीर महा बिकराल ॥
कहा री करूं कित जाऊंरी सजनी को मेटै जंजाल ।
लटक चलन बाँकी चितवन की चुभत कलेजे भाल ॥
भइ ऐसे यह देह दूबरी सूझ परो नस जाल ।
तरफत हूं हिय में दव लागी नैना बरत मशाल ॥
चरणदासी यह सखी तिहारी हो शुकदेव दयाल ।
आय कृपा करि दर्शन दीजै कीजै वेगि निहाल ॥
राग बिलावल ॥
लागीरी मौहनसों डोरी ।
आनि कानि कुलकी तजि दीन्ही कोऊ कैसी बात कहोरी ॥

भक्ति-पदारथ, ब्रह्मज्ञान, अमरलोक एवं पञ्चोपनिषद् भाषा

३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्याम सलोने के रँगराती मगन भई कोइ परी ठगोरी ।
निरखत छवि तनकी सुधि बिसरी प्रेम प्रीति रसमें भइ वौरी ॥
ऐसो रूप उजारो प्यारो शोभा वर्णत शेष थकोरी ।
तीनि लोक ब्रह्माण्ड सकल सब जाकी मायासों दरशोरी ॥
कान कुण्डल गलमाल बिराजै शीश मुकुट माथे तिलक फंबोरी ।
नखशिख भूषण कर लिये लकुटी कांधे सोहै पीत पिछोरी ॥
कल न परत निशि दिन बिन देखे रोम रोम मेरे वही रमोरी ।
कान्ह सुजान सदा सुखदायी चरणदास के हिये बसोरी ॥
राग झँझोटी ॥
आया मैंडा मोहन मदनगोपाल ।
मानौ रङ्क अष्टसिधि पाईं निरखत भई निहाल ॥
बलिबलि जांदियां अँगन समांदियां मोहिं दरश दियोलाल ।
कोटि भानु छवि मुखपर वारूं बदा सोहै भाल ॥
अद्भुत रूप अनूप सांवरो सुन्दर नैन विशाल ।
घूँघरवारी अलकैं झलकैं चिकने लंबे बाल ॥
चितवत तीषी भौंह मरोरत कर लिये वेणु रसाल ।
गावत तान आनि बांकी सों चलत अनोखी चाल ॥
श्रीशुकदेव दया के सागर नटनागर नँदलाल ।
चरणदास को किरपा करिकै रीझ दई उरमाल ॥
राग काफी ॥
लटकरी चालपै मैं वारी-वारी जांदियां ।
रैन दिना सानूं ध्यान 'तुसाडो मन वच के हूँदी बांदिया ॥
कुण्डल कान मुकुट शिर सोहै शोभा अधिक सुहाँदियां ।
अलबेली छवि बाँके नैना निरखत नैन लुभाँदियां ॥