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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 690 में से

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पृष्ठ 393

३५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
कुल नाते परिवार सँभारे साधनकी नहिं टहल करे ॥
राजी माला तिलक सुधारि सवाँरे राखत छलवल मकर घने ।
अन्तर और निरन्तर औरै सिंह गऊमुखं रहत बने ॥
राजी ऐसी भक्ति मुक्ति नहिं पावै करम लगैं अरु नरक परे ।
यमके दण्ड दहन पावककी जनम मरण योनाहिं टरे ॥
राजी लक्षण प्रेम सहित जप कीजै भीतर बाहर उघरनचे ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरीरीझैं जब व्याधि दचे ॥
मालाफेरी कहाभयो
अन्तर के मनको नहिं फेरा पाप करत सब जन्मगयो ॥
पर निन्दा परनारि न भूलो खोटकपटकी ओरनयो ।
काम क्रोध मद लोभ न खोये है रह्यो मूरख मोहभयो ॥
दुनियां सांचसमझघर कीन्हो धन जोरनको परनलयो ।
दया धर्म दोउ मारग छोड़े मँगतन को नहिं दानदयो ॥
गुरुसों झूठ भगल साधन सों हरिको नाहिं नेहजयो ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कैसे कहिये मुकतहयो ॥
राग हेली ॥
और उपासन कोय हेली टेक हमारे नामकी ।
आन शरण जाऊं नहींरीअरी हेली होनी होयसो होय ॥
योग यज्ञ तप नामहींरी अरी हेली नाम.नक्षत्र वार ।
सकल शिरोमणि नाम है तन मन डारूं वार ॥
अठ सठ तीरथ नामहींरी अरी हेली नाम हमारे नेम ।
नामहीं सूं राची रहूँ नाम हमारे प्रेम ॥
वरत हमारे नामहारी अरी हेली इष्ट हमारे नाम ।
अर्थ धर्म फल नाम हीं नाम मुक्ति को धाम ॥