भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 383, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निर्वासी है । अद्वै निराकार जानौ सतचिदानन्द मानौ पुरुष
को रूपधरि माया परकासी है ॥ नेति नेति वेद कहैं अस्तुति
माहीं रहैं भेद कछु नाहीं लहैं थकथक जासी है । योग ध्यान
आवै नाहीं ज्ञानसों न गहौजाई भक्तों के हिये माहि सदा जो
विलासी है ॥ सन्तों हेतु देह धरै आयके सहायकरै पृथ्वी को
दुःख हरै घटघटवासी है। एहो चरणदास जन वासों क्यों न
लावो मन शुकदेव कृपाघन खोलिदइ गांसी है ॥
सावरो सलोनोप्यारो मेरे मनभायो है माई ॥ कहा कहूं शोभा
वाकी तीन लोक माया जाकी शेषहू की रसना थाकी पारहून
पायो है । निरगुण निराकार कोऊ कहा जानै सार सन्तों की
सहायकाजे देह धरि आयो है ॥ ब्रजहू में कौतुक कीन्हे सन्तन
को सुखदीन्हे मुरली बजाय गाय रीझिकै रिझायो है । योगी
जाको ध्यान लावैं ब्रह्मा अरु वेदगावैं ताको तौ यशोदा माता
गोदमें खिलायो है ॥ चरणदास सखीपर शुकदेव कृपाकीन्ही
बांकोसो विहारी एक पलमें दिखायो है ॥
बधाई राग मलार ॥
बधाई सबही ब्रज सोहाई ।
मुदितभये वसुदेव देवकी मनमें अति अधिकाई ॥
पहुँचे जाय महरि घरमाहीं काहू भेद न जानो ।
यशुमति रानी बालक जन्म्यो सबने योंकर मानो ॥
घर घर मंगलचार भये हैं बन्दरवार बँधाईं ।
नूतन बस्तर पहिरि पहिरि कै नारि सबै घिरिआई ॥
करि कौतूहल मिलि मिलि गावत करैं उछाह घनेरा ।
याचक भीर बहुत भइ द्वारे बजत दमामे भेरा ॥