भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जब जब प्रकटे चारों युगमें सत कलि द्वापर त्रेता ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सन्तनही के हेता ॥
सखीरी आज गोकुल भाग बड़ाई ।
दर्शन दे वसुदेव देवकी नँदघर प्रकटे आई ॥
भादौंमास वदी बुध आठौं ग्रह नक्षत्रर नीके ।
यशुमति रानी गोद सिरानी भये मनोरथ जीके ॥
भयो उछाह स्वरग के माहीं देव सभी हर्षाये ।
अपने अपने बैठि विमानन पुष्प अधिक वर्षाये ॥
यह धरती परफुल्ल भई है फूलउठा वन सारा ।
कालिन्दी को बड़ो उमाहो करिहैं लाल विहारा ॥
किरपासागर होय उजागर मर्यादा बँधबांधन ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं कारण अपने साधन ॥
सखीरी सुन देख अभी मैं आई ।
यशुमति रानी बालक जायो यहतोहिं आनि सुनाई ॥
नयनि डोलै हँसि हँसि बोलै घर घर कहत बधाई ।
भयो उछाह सकल गोकुल में बातभई मनभाई ॥
सुन सुन आपस में मुसकाने देन बधाई लागे ।
भूषण वस्तर लगे सवाँरन नरनारी रसपागे ॥
वनसों रहे गये नँदद्वारे ग्वाल सभी हरषाये ।
बड़ो पौरि के आगे याचक गावनहीं को आये ॥
मैं घर जाऊ वनकर आऊं तुमहूं देह शिंगारो ।
साथ चलेंगी जाय मेलेंगी होइहै कौतुक भारो ॥
शुकदेवा का मुँह देखेंगी करिहैं अधिक हुलासा ।
ऐसे कहि वह भवन सिधारी भनै चरणहीदासा ॥