भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३६१
चरणदास शुकदेव बिछोहा तेरी सूं नहिं सहसूं ॥
राग कान्हड़ा ॥
तुम बिन अति व्याकुल भइयाँ ।
मोहूंकों दर्श दिखावरे मोहन प्यारे ।
चितवन नैन हँसन दसनन की अटक रही हिय महयां ॥
वह लटकन मटकन चटकन पट मोरमुकुट की छविछइयां ।
अधर मधुर मुरली सुर गावत टेरि बुलावत गइयां ॥
हाहा खाऊं शीश नवाऊं और परूं तोरे पइयां ।
वारीहूं वारी मुख ऊपर दोउ कर लेहुँ बलइयां ॥
अब तौ धीर रहो नहिं रंचक हो शुकदेव गुसइयां ।
चरणदासी भइ प्रेम बावरी आनि गहो क्यों न बहियां ।
राग पर्ज ॥
तुम बिन कैसे जीऊं प्यारे नँदलाल ।
भूख प्यास कछु लागत नाहीं तन की सुधि न सँभाल ॥
कल न परत कल कल अकुलावौं छिन छिन छिन बेहाल ।
विरह व्यथा को रोग बढ़ो है पीर महा बिकराल ॥
कहा री करूं कित जाऊंरी सजनी को मेटै जंजाल ।
लटक चलन बाँकी चितवन की चुभत कलेजे भाल ॥
भइ ऐसे यह देह दूबरी सूझ परो नस जाल ।
तरफत हूं हिय में दव लागी नैना बरत मशाल ॥
चरणदासी यह सखी तिहारी हो शुकदेव दयाल ।
आय कृपा करि दर्शन दीजै कीजै वेगि निहाल ॥
राग बिलावल ॥
लागीरी मौहनसों डोरी ।
आनि कानि कुलकी तजि दीन्ही कोऊ कैसी बात कहोरी ॥