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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 690 में से

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पृष्ठ 384

शब्दवर्णन । ३४५
जिसलायक देखा सो दीन्हा करी शुश्रुषा भारी ।
इक आवत इक जात बिदाहो देत अशीश महारी ॥
धनिगोकुल धनिंपौरि भवनधनि आये हैं जगदीश ।
शिव ब्रह्मादिक ध्यान धरत हैं लख ईशनको ईशा ॥
दुष्टदलन सन्तन सुखकाजैं लीन्ह्यो है औतारा ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं जगपति सिरजनहारा ॥
नन्दघर कौतुक करन नवीने ।
जो जो वचन किये थे आगे सो आ पूरण कीने ॥
भक्तबछल करतार गुसाईं धरिआये औतारा ।
रक्षाकारण साधु ऋषिनकी भूमि उतारण भारा ॥
जब जब भार बढ़त पृथ्वीपर तब तब होत सहाई ।
मर्यादा पुरुषोत्तम येही बिगरी सबै बनाई ॥
निरगुणसों सरगुण वपुधारे कष्ट निवारण काजै ।
योगेश्वर जेहि ध्यान लगावैं नामलिये अघ भाजै ॥
भाग बड़े यशुमति रानी के दर्शन दीन्हें आई ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सुर मुनि करी बधाई ॥
जगतपति देखि महरघर आये ।
बाल चरित्र ही दिख्‌लावन आनँद अधिक बधाये ॥
तप कीन्हों थो नन्द यशोदा पिछले जन्म अघाई ।
वरमांगो थो हम सुत होके खेलो भवन मँझाई ॥
वचन न मोड़ा आय विराजे भक्तोंवश सुखदाई ।
जो जो चाहो सो सुखदीयो हुये कुँवर कन्हाई ॥
संग लियो समीप मुक्तिको ब्रज में अवन कियो है ।
सुख उपजायो नर नारिनको दर्शन आय दियो है ॥