भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३५७
ठनन ठनन ठन नूपुरकी धुनि झनन झनन झनकारी ॥
थेइ थेइ थेइ थेइ नचत दोऊ मिलि विहँसि विहँसि मुसकारी ।
चरणदास शुकदेव दयासू पायो दरश मुरारी ॥
रास रामकली वा भैरौं ॥
नृत्यत गोपाललाल तत्ततता थेई ।
नखशिख श्रृंगार कियें राधा गल बाँह दियें सखियनसंग
नाचत स्वर ताल तान देई ॥ तननन तंबूर गिड गिड धुध-
कधू मृदंग ताल झम झम झै झांझ बजतबीन बाँसुरी । झन-
नन झनकार होत पायल ठनकार राग गावत कल्याण और
नट धनासिरी ॥ कबहूँ लै कान्हरा अलाप कभू सोरठ को
परज अरु विहागरो केदारा आसावरी । कबहूं कै बिभास
मालसिरी ललित रामकली भरहूँ विलावल धुनि धुर्पद को
चावरी ॥ सुन्दर बहु भेष धरें रासको विलासकरें मुनिजन
मनहरें बढ़ो आनँद उं ह ठाहीं । अद्भुत छवि कहा कहूं किरपा
शुकदेव चहूं चरणदास होय रहूं चरणकमल माहीं ॥
रास राग पंचम ॥
सखी दोऊ रसिक प्रीतम पिय प्यारी ।
मिलि खेलत हैं रास छवि कहिन जाई ।
एककी एक सों सरस शोभा बनी निरख सब सुरमुनी रहे
लुभाई ॥ कोऊ कर बनिलै सुधरस्वर तालदै गावत संगीत
रीझत रिझाई । थुंकना थुंगना धुधक धूधूकृत बजत मिरदंग
गति अति सुहाई ॥ तार मुरुचंग स्वरसससों मुरलिका मधुर
धुनि चतुर शारंग बजाई । नचत दोउ भावसों अधिक बहुचाव
सों तत्तथेई थेई थेईलगाई ॥ कबहूं पियप्यारी जू मान करें
लालसों कबहूं भुजगहि पियाले मनाई । धरत सुन्दर डगन