भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्याम सलोने के रँगराती मगन भई कोइ परी ठगोरी ।
निरखत छवि तनकी सुधि बिसरी प्रेम प्रीति रसमें भइ वौरी ॥
ऐसो रूप उजारो प्यारो शोभा वर्णत शेष थकोरी ।
तीनि लोक ब्रह्माण्ड सकल सब जाकी मायासों दरशोरी ॥
कान कुण्डल गलमाल बिराजै शीश मुकुट माथे तिलक फंबोरी ।
नखशिख भूषण कर लिये लकुटी कांधे सोहै पीत पिछोरी ॥
कल न परत निशि दिन बिन देखे रोम रोम मेरे वही रमोरी ।
कान्ह सुजान सदा सुखदायी चरणदास के हिये बसोरी ॥
राग झँझोटी ॥
आया मैंडा मोहन मदनगोपाल ।
मानौ रङ्क अष्टसिधि पाईं निरखत भई निहाल ॥
बलिबलि जांदियां अँगन समांदियां मोहिं दरश दियोलाल ।
कोटि भानु छवि मुखपर वारूं बदा सोहै भाल ॥
अद्भुत रूप अनूप सांवरो सुन्दर नैन विशाल ।
घूँघरवारी अलकैं झलकैं चिकने लंबे बाल ॥
चितवत तीषी भौंह मरोरत कर लिये वेणु रसाल ।
गावत तान आनि बांकी सों चलत अनोखी चाल ॥
श्रीशुकदेव दया के सागर नटनागर नँदलाल ।
चरणदास को किरपा करिकै रीझ दई उरमाल ॥
राग काफी ॥
लटकरी चालपै मैं वारी-वारी जांदियां ।
रैन दिना सानूं ध्यान 'तुसाडो मन वच के हूँदी बांदिया ॥
कुण्डल कान मुकुट शिर सोहै शोभा अधिक सुहाँदियां ।
अलबेली छवि बाँके नैना निरखत नैन लुभाँदियां ॥