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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 390

शब्दवर्णन । ३५१
राग बिलावल ॥
अब तू सुमिरण कर मन मेरे ।
अगले पिछले अब के कीये पाप कटैं सब तेरे ॥
यम के दंड दहन पावककी चौरासी दुख प्रेरे ।
भर्म कर्म सबही कटिजैहैं जगत् ब्याध उरमेरे ॥
पैहै शक्ति युक्ति गति आनँद अमरहिलोक बसेरो ।
जन्मै मरै न योनि आवै या जग करै न फेरो ॥
सुमिरण साधनमाहिं शिरोमणिजो सुमिरण करि जानै ।
काम क्रोध मद पाप जरावै हरि बिन और न मानै ॥
गुरु शुकदेव दियो है सुमिरण बिन जिह्वा करिलीजै ।
चरणदास कहैं घेरि घेरिकरअर्धउर्ध मन दीजै ।
राग केदारा ॥
अरे मन करो ऐसो जाप ।
कटैं संकट कोटि तेरे मिटैं सगरै पाप ॥
चेत चेतन खोज करले देख आपा आप ।
कागसों जब हंस होवै नामके परताप ॥
ध्यान आतम सुरति राखौ छुटै त्रैगुण ताप ।
सुरतिमाला सुमिरि हिरदै छाँड़ सकल संताप ॥
परा भक्ति अगाध अद्भुत विमल अरु निष्काम ।
चरणदास शुकदेव कहिया बसैं निजपुर धाम ॥
राग भैरौं ॥
राम राम राम राम राम राम गावो ।
मनके रोग सकल बिसरावो ॥
नाम प्रताप शिला जलतारी ।