भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अग्नि में प्रह्लाद राखो दियो नहीं जरन ॥
गिरिशिखरसों डारि दीन्हो लगो करुणाकरण ।
दीन जानि संभार लीन्हो कियो ठाढ़ो धरन ॥
खम्भ बांधो खङ्ग काढ्यो दुष्ट लागो अरन ।
अब बता तेरो राम कितहै गहौ वाकी शरन ॥
ढीठ हो प्रह्लाद भाष्यो डारि शंका डरन ।
मोमें तोमें खङ्ग खम्भे मध्य नारी नरन ॥
खम्भ फटकर भये परगट धरो नरसिंह वरन ।
असुर मारो जन उबारो पुहुप वरषे सुरन ॥
मोहिं गुरु शुकदेव कहिया सेव सोई चरन ।
चरणदास उपासना दृढ़ होय तारण तरन ॥
राग अलहिया ॥
सुमिरु मन राम नाम ततसार ।
जिन जिन सुमिरो सो सो उतरे भवसागर सों पार ॥
वेद पुराण और षटमाहीं तारण को यहि योग ।
जौपै पांचौ प्रेत निवारै अरु इन्द्रिन के भोग ॥
साधन संयम पूजा अर्चन और करै तपदान ।
नाम समान न फल काहू में करि देखी पहिंचान ॥
जो जप करै धरै हिरदै में आशा सकल बिड़ार ।
तीन लोक में धनि धनि होवै शोभा अगम अपार ॥
सब धर्मन परधान नाम है सब इष्टन शिरमौर ।
निश्चय पकड़रहो याही को सकल विकल तजि दौर ॥
तामें ज्ञान भरोही दीखै पावै ब्रह्म विचार ।
गुरु शुकदेव दियो दृढ़ मोकूं चरणहिं दास सँभार ॥