भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३५३
चरणदास आधीनके निश्चय मनआयो ॥
सांचा सुमिरण कीजिये जामें मीन न मेख ।
ज्यों आगे साधुन कियो वाणी में देख ॥
एजी टेक गहौ दृढ़भक्ति की नौधा हिय धारि ।
सन्तन की सेवा करो कुलकानि निवारि ॥
एजी जासों प्रेमा ऊपजै जब हरि दरशाय ।
आगे पीछेही फिरै प्रभु छोड़ि न जाय ॥
एजी चारि मुक्ति वांदी अष्टैसिद्धि चरननमाहिं ।
तीरथ सब आशा करैं अध देख नसाहिं ॥
एजी कहैं गुरू शुकदेवजी चरणदास गुलाम ।
ऐसी धारन धारिये रहिये निष्काम ॥
ऐसा सुमिरण कीजिये सुनिहो मनमेरे ।
रसना राम उचारिये कर माला फेरे ॥
एजी निन्दा अकस न राखिये काहू दुखनहिं दीजै ।
सन्तन सूं सनमुख रहो गुरसेवा लीजै ॥
एजी भूखे भोजन दीजिये प्यासे नीर पियावो ।
सबसे नीचा ह्वै चलो अभिमान नशावो ॥
एजी सतसङ्गति में मिलिरहौगुरुमतसूं रहिये ।
आन धर्म नहिं चालिये यमदण्ड न सहिये ॥
एजी तामसकूं विषज्यों तजो शुकदेव बतावै ।
चरणदास हरि हरि जपै मुकता ह्वै जावै ॥
थोथे सुमिरण कहा सरे ।
मनकेरौग शोक नहिं खोये हिंसा डूबे अकसंजरे ॥
एजी नारी सुतसूं मोह कियौहै नेक न हरिके प्रेमअरे ।
१ टहलुई २ गुस्सा ॥